Part 4
पहला कर्मचारी तेज कदमों से मोनालिसा के कमरे की तरफ चलने लगा। उसके दिमाग में शैतानी ख्यालों ने घर कर लिया था। पर यह पहली बार नहीं थाऐ इससे पहले भी वह ऐसे ही कोई महिलाओं को और लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बना चुके थे। जिंदा तो जिंदा, पर महिलाओं की लाशों के साथ भी वह लोग घिलौना कृत्य करने में जरा भी नहीं हिचकीचाते थे। मोनालिसा के कमरे के पास पहुंचा और दरवाजे पर लगा लॉक निकाला। कमरे के भीतर दाखिल हुआ तो सुनिता जमीन पर लहुलुहान हालत में पड़ी थी.... उसने बेड पर नजर डाली तो उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह सन्न रह गया क्योंकी मोनालिसा की लाश वहां पर नहीं थी।
वो सोच में पड़ गया। क्योंकी महिला कर्मचारी सुनीता अभी भी ज़मीन पर बेहोश पड़ी थी। किंतु मोनालिसा...?
'उसकी लाश कहाँ गई?'
उसका गुस्सा फूट पड़ा।
"उस हरामी ने मुझे धोखा दिया!"
क्या हुआ है वह समझ चुका था। उसका साथी यानी दूसरा कर्मचारी मोनालिसा की लाश को कहीं और ले जाकर अकेले ही मज़ा कर रहा है।
उसकी आँखों में गुस्से की लपटें जल उठीं।
वह दाँत पीसते हुए दूसरे कर्मचारी को खोजने के लिए दौड़ पड़ा।
*****
इधर स्टोअर रूम से बाहर निकलकर दूसरा कर्मचारी सीधा मोनालिसा के कमरे में पहुँचा। लेकिन जैसे ही वह कमरे में दाखिल हुआ, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मोनालिसा कहाँ गई?"
और उसके दिमाग में भी वही ख्याल आया। उसी के साथ अपने दोस्त की तलाश में वह कमरे से बाहर निकला।
******
बारिश अब हल्की पड़ चुकी थी, लेकिन असाइलम के गलियारों में एक अजीब सन्नाटा था—जैसे कोई अनदेखी ताकत यहाँ के हर कोने में छिपकर बस सही समय का इंतजार कर रही हो।
पहला कर्मचारी गुस्से में पैर पटकता हुआ स्टोर रूम की ओर बढ़ा।
"साला यहाँ ही छिप होगा !"
दरवाजे पर पहुँचकर उसने उसे धक्का दिया।
कर्रर्रर्र...आवाज करते हुए दरवाजा खुला। और एक ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया।इतनी ठंडी कि उसकी हड्डियाँ काँप उठीं।
उसने झटके से अंदर कदम रखा और चारों ओर देखने लगा। अंधेरा। गहरा काला अंधेरा। बस दूर एक कोने में हल्का-सा बल्ब टिमटिमा रहा था।
उसने स्विच दबाकर लाइट चालू कर दी।
पीली रोशनी में पुरानी अलमारियाँ, धूल से भरे फर्नीचर और कोनों में जमी मकड़ियों की जालियाँ दिखने लगीं।
"अबे! कहाँ छुपा है? बाहर आ!"
उसने गुस्से में चिल्लाते हुए अपने साथी को आवाज दी।
कोई जवाब नहीं आया।
हवा अब भी सर्द और भारी थी, जैसे कमरे में कोई और भी मौजूद हो।
उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाते हुए कहा।
"मुझे पता है मोनालिसा को लेकर तू यही कही छुपा है। चल अब नाटक बंद कर। बाहर आ।"
अपने दोस्त को आवाज देते हुए वह आगे बढ़ने लगा।
फर्श पर पड़े पुराने कागज और धूल उसके पैरों के नीचे दबकर सरसराने लगी।
तभी...
उसकी नज़र नीचे फर्श पर पड़ी।
एक अलमारी के पीछे जमीन पर पड़ी मोनालिसा का चेहरा नजर आ रहा था।
सफ़ेद... स्थिर... निर्जीव।
उसके मन में एक ही ख्याल आया।
"ये कमीना लाश को यहाँ घसीटकर ले आया और अब इसके साथ मज़े कर रहा है!"
गुस्से से उसकी आँखें लाल हो गईं।
उसने तेज़ी से कदम बढ़ाए।
लेकिन...सर्रर्रर्रर...
उसने अपनी आँखों के सामने देखा
मोनालिसा की लाश अचानक खींची जाने लगी!
जैसे कोई उसे घसीटकर अंधेरे में ले जा रहा हो।
"अबे रुक... क्या कर रहा है तू?"
उसने गुस्से से दहाड़ा और अलमारी को लांघकर वहां तक पहुँचा। पर कुछ नहीं था।
मोनालिसा की लाश गायब हो चुकी थी।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
तभी...
दूर एक अलमारी के पीछे फर्श पर फिर वही चेहरा दिखाई दिया। मोनालिसा का निर्जीव चेहरा।
"अबे कमीनें! तू क्या कर रहा है?" उसने दाँत पीसते हुए अपने साथी को चेतावनी दी।
पर इस बार...
लाश और तेज़ी से घसीट ली गई!
सर्रर्रर्ररर!
उसके कदम ठिठक गए।
गुस्से में वह दौड़ता हुआ अलमारी के पीछे पहुँचा।
पर वहाँ कुछ भी नहीं था।
सिर्फ धूल।
अब उसे सचमुच गुस्सा आने लगा।
तभी उसके ठीक पीछे की एक अलमारी का दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा। लकड़ी के रगड़ खाने की तीखी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा। उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
अंधेरे में डूबी उस अलमारी का दरवाजा पूरी तरह खुल चुका था।
अंदर...
कुछ था वहाँ।
कोई... या कुछ... जो उसे देख रहा था।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
उसने गला साफ़ किया और गुस्से से चिल्लाया—
"बस बहुत हो गया ! अगर तू नहीं रुका, तो मैं तुझे जान से मार दूँगा! मोनालिसा को मेरे हवाले कर दे!"
कमरा बिलकुल शांत था।
बस हल्की-हल्की हवा की सरसराहट थी।
पर अचानक...
उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी महसूस हुई।
ठंडी सांसों की छुअन उसकी गर्दन से होकर गुज़री।
उसका शरीर झनझना उठा।
उसने झट से पीछे मुड़कर देखा—
और तभी...
उसके मुँह से दर्द से भरी चींखें निकलने लगी। इतनी ज़ोर से कि पूरा स्टोर रूम उसकी गूँज से काँप उठा और उसी के साथ पुरे मेंटल एसाइलम में मरिज जोर जोर से चीखने लगे।
अपने दोस्त की वो चिल्लाने की आवाज सुनकर ऑफिस के कमरे में शराब की बोतल रखने आया दुसरा कर्मचारी बुरी तरह घबरा गया था। उसके कानों में न सिर्फ अपने साथी की दिल दहला देने वाली चीखें गूंज रही थीं, बल्कि पूरे मेंटल असाइलम के मरीज चिल्ला रहे थे। चारों तरफ से आती वह भयानक आवाजें उसके दिमाग में हथौड़े की तरह चोट कर रही थीं।
उसका बदन पसीने से भीग चुका था, पर किसी अनहोनी की आशंका से भरे दिल के साथ वह दौड़ता हुआ स्टोर रूम की ओर बढ़ा। उसका साथी अंदर फंसा हुआ था, और उसकी चीखें धीरे-धीरे धीमी पड़ रही थीं।
गिरते पडते वह स्टोर रूम के सामने पहुंचा, दरवाजा अंदर से बंद था। उसने झट से हैंडल घुमाने की कोशिश की, पर दरवाजा हिला तक नहीं। घबराहट में उसने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। इस बीच, मरीजों की दिमाग हिला देने वाली आवाजें और तेज हो गईं। उन आवाजों ने जैसे उसका दिमाग कुतरना शुरू किया था। अब वो खुद भी चिल्लाते हुए अपने दोनों कानों को कसकर पकड़कर जमीन पर बैठ गया। उसकी सांसें तेज हो गई थीं, दिल की धड़कन जैसे कानों में गूंज रही थी। अचानक, वह सब आवाजें शांत हो गईं। ना मरीजों के चिल्लाने की आवाज आ रही थी ना उसके दोस्त की आवाज आ रही थी। चारों ओर एक जानलेवा सन्नाटा छा गया था।
वह घबराते हुए उठा और स्टोर रूम के दरवाजे की ओर देखा। वह अब आधा खुला था।
"ये… ये कैसे हो सकता है?"
उसका दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया।
क्रमशः