Trikon - 21 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 21 — तोहफा

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 21 — तोहफा

स्टोरेज यूनिट के भीतर चार बड़े मिलिट्री ड्रोन रखे थे।

काले मैट फिनिश वाले भारी ढाँचे।

चार-चार मोटे रोटर।

नीचे गिम्बल पर लगे हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे।

दो ड्रोन के पेट के नीचे छोटे लेकिन खतरनाक मशीन-गन मॉड्यूल भी फिट थे।

सभी एक लंबी चार्जिंग स्टेशन रेल से जुड़े हुए थे।

नीली लाइटें जल रही थीं।

हर यूनिट के ऊपर छोटा इंडिकेटर—

FULL CHARGE — 48 HOURS

बीच की मेज़ पर एक टैबलेट कंट्रोल यूनिट रखी थी।

साथ में एक लंबी रिमोट आर्म-बैंड कंट्रोल रिग—

जिसे बाजू पर बाँधकर ड्रोन उड़ाया जा सकता था।

अनीश ने चारों ड्रोन को देखते हुए धीमे से सीटी बजाई।

“कौन है भाई तेरा ये दोस्त?”

जोगी ने एक ड्रोन का फ्रेम थपथपाया।

“कई साल आर्मी में रहा।

अब डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर है।

बड़ा आदमी है।

कहा था ज़िंदगी में एक बार मदद करेगा।”

अनीश ने भौंह उठाई।

“और वो फ़ेवर तूने आज उड़ा लिया?”

हल्की हँसी।

“ग़ज़ब आदमी है तू।

चाहे तो उससे करोड़ों माँग सकता था।”

जोगी ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया—

“अगर वो लड़कियाँ बच जाएँ…”

एक सेकंड रुका।

“…तो उससे बड़ी खुशी मेरे लिए कुछ नहीं।”

दोनों ने जल्दी-जल्दी काम शुरू कर दिया।

ड्रोन पर मोटे तिरपाल और कपड़े डाले।

एक-एक करके उन्हें उठाया।

वो भारी थे।

लगभग पचास-पचास किलो।

गाड़ी की डिक्की और पीछे के हिस्से में सावधानी से लाद दिए।

अनीश ने कमर सीधी करते हुए कहा—

“बाप रे…

मैं तो शादी में वीडियो बनाने वाले हल्के खिलौने देखता था।

ये ड्रोन तो साले तो टैंक हैं।”

जोगी हँस पड़ा।

“दो साल ऐसे ही ड्रोन को उड़ाया है मैंने।

इंजीनियरिंग साइड में ड्रोन ऑपरेटर का भी काम किया करता था।”

डिक्की बंद हुई।

कुछ ही मिनट बाद उनकी गाड़ी स्टोरेज यूनिट से बाहर निकलकर सड़क पर आ गई।

गाड़ी अंधेरे में आगे बढ़ने लगी।

कुछ दूरी पीछे— झाड़ियों की ओट में खड़ी वही कार धीरे से बाहर निकली।

उसका इंजन पहले से चालू था।

बिना हेडलाइट जलाए वह चुपचाप अनीश और जोगी की गाड़ी के पीछे हो ली।

हाईवे पर गाड़ी दौड़ रही थी।

अचानक—

टुन।

जोगी के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका।

अनीश ने साइड से देखा।

“क्या है?”

जोगी ने स्क्रीन खोली।

Encrypted Message — Zeroin

सिर्फ दो लाइनें थीं—

“तुम्हारा पीछा किया जा रहा है।”

जोगी ने पढ़कर सुनाया।

अनीश ने तुरंत रियर-व्यू मिरर देखा।

दूर पीछे—

हेडलाइट्स की एक जोड़ी।

उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

“ये गाड़ी तो पहले भी दिखी थी।”

उसने स्टीयरिंग कसकर पकड़ लिया।

फिर धीरे से बोला—

“ठीक है… पहले इस मेहमान से मिल लेते हैं।”

उसने अचानक एक्सेलेरेटर दबाया।

गाड़ी तेज़ी से अंधेरे में आगे निकल गई।

कुछ मिनट बाद—

एक मोड़ पर

अनीश की गाड़ी अचानक गायब हो गई।

पीछे आती कार धीमी हो गई।

ड्राइवर ने इधर-उधर देखा।

सड़क खाली।

कुछ आगे जाकर उसने गाड़ी रोकी।

फिर यू-टर्न लेने के लिए घुमाने लगा।

तभी—

बाहर से अचानक उसकी कनपटी पर ठंडी बंदूक लग गई।

“बाहर निकल साले।”

अनीश था।

ड्राइवर जम गया।

धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला।

उधर दूसरी तरफ—

जोगी बंदूक ताने खड़ा था।

उसने जल्दी से कार के अंदर झाँका।

पीछली सीट।

डिक्की।

कुछ नहीं।

“अंदर और कोई नहीं है, अनीश सर।”

ड्राइवर बाहर आ गया।

अनीश ने गौर से देखा।

फिर भौंहें सिकुड़ गईं।

“इंस्पेक्टर… बांक़ेलाल।

तू साला?”

कुछ देर बाद तीनों सड़क किनारे खड़े थे।

सामने बांक़ेलाल।

सिर झुकाए।

अनीश ने सिगरेट सुलगाई।

“बांक़ेलाल चतुरंगिणी दास…”

धुआँ छोड़ा।

“पूरे प्रदेश का सबसे करप्ट पुलिस वाला।

दो करोड़ तो तूने उस थाने वाले ड्रग डीलर को भगाने के लिए ही लिए थे… है ना?”

बांक़ेलाल चुप।

सिर झुकाए खड़ा।

जोगी ने पूछा—

“हमारे पीछे क्यों पड़े हो?”

कुछ सेकंड सन्नाटा।

फिर बांक़ेलाल की आवाज़ टूटी।

“बहुत रिश्वतें लीं, अनीश सर…

बहुत ग़लत काम किए।”

गला भर आया।

“पर… जब मेरी भतीजी छह महीने पहले उठा ली गई…

उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

तब समझ आया मैं कितना ग़लत था।

सुपीरियर… मेरे अंडरवर्ल्ड वाले दोस्त…

किसी ने साथ नहीं दिया, सर।”

वह फूट-फूट कर रोने लगा।

एक बड़े आदमी को रोते देख जोगी थोड़ा पिघला।

पर अनीश चुप खड़ा था।

मानो बांक़ेलाल को मन ही मन तौल रहा हो।

कुछ देर तक दोनों उसे देखते रहे।

फिर अनीश और जोगी थोड़ा हटकर एक तरफ आ गए।

जोगी धीमे बोला—

“क्या कहते हो, सर?

दो हाथ और मिल जाएँगे।”

अनीश ने दूर खड़े बांक़ेलाल को देखा।

कुछ पल चुप रहा।

फिर सिर हिलाया।

“नहीं यार।

बहुत करप्ट है साला।

घड़ियाली आँसू भी हो सकते हैं।”

अनीश वापस उसके पास गया।

सीधे कहा—

“अपने साथी बहुत सोच-समझ कर चुनता हूँ।

वापस लौट जा।

और हमारा पीछा मत करना।”

बांक़ेलाल ने सिर झुका लिया।

“मैं समझता हूँ, सर।”

वह चुपचाप अपनी कार में बैठा।

इंजन स्टार्ट किया।

और धीरे-धीरे

अंधेरे में गुम हो गया।

छेदीपुरा गाँव का एक छोटा मिट्टी का घर।

अंदर हल्की लालटेन की रोशनी।

चिंटू धीरे से अंदर वाले बैडरूम के दरवाज़े के पास आकर रुक गया।

अंदर से हँसी की आवाज़ आ रही थी।

उसने झाँककर देखा।

बिस्तर पर उसकी माँ पारो और प्रभु चादर ओढ़े लेटे थे।

प्रभु ने पारो की तरफ झुककर चादर हटानी चाही।

पारो ने उसका हाथ झटक दिया।

“रहने दो जी ये सब…

मुझसे शादी के वायदे किये थे… उसका क्या?”

प्रभु पीछे होकर लेट गया।

हल्का हँसा।

“पारो जी… आप भी न।

बस छोटी सोच रखती हो।”

वह छत की तरफ देखते हुए बोला—

“अरे जॉन साहब ने खुद कहा है…

एक करोड़ रुपये देंगे।

मेरे काम का इनाम।”

पारो की आँखें फैल गईं।

“एक करोड़?

बाप रे…”

प्रभु हँसा।

“फिर क्या?

तुम्हें गहनों में लाद दूँगा।

सोना… चाँदी… सब।”

पारो हँसी।

“फिर तो लो… सब आपका ही है।”

चादर एक तरफ सरक गई।

चिंटू ने तुरंत मुँह फेर लिया।

उसका चेहरा सख्त हो गया।

आँखों में नफ़रत भर आई।

वह चुपचाप पीछे हट गया और घर से बाहर चला गया।

अंदर प्रभु बिस्तर से उठा और बाथरूम की ओर चल दिया।

अंदर जाकर पानी का झरना चलाया।

“अंदर आ जाइए पारो जी।”

पारो टॉवल ओढ़कर अंदर आयी।

प्रभु ने टॉवल खींचकर एक ओर फेंक दिया।

पारो शर्मा कर सिमट गई।

प्रभु हँसा—

“अरे अब क्या छिपाती हो। ऐसे सिमटेगी तो गहने कैसे पहनाऊँगा?”

पारो ने शर्माकर निचला होंठ काटा।

प्रभु ने उसे आदेश जैसा इशारा किया—

“हाथ ऊपर।”

पारो ने झिझकते हुए वैसा ही किया।

“चल अब घुटनों पर आजा।”

पारो हँसी और घुटनों पर बैठ गई।

प्रभु बुदबुदाया—

“यहाँ से एक बार निकला तो… तू कौन मैं कौन।”

पारो ने पूछा—

“कुछ कहा आपने?”

प्रभु हँस पड़ा—

“नहीं नहीं… लगी रहो।”

कुछ देर बाद—

प्रभु घर से निकला।

अपने कपड़े ठीक करता हुआ।

सराय की दिशा में चल पड़ा।

चिंटू दूर से उसका पीछा करने लगा।

छिपता हुआ।

दीवारों के पीछे।

पेड़ों के पीछे।

सराय के पास पहुँचकर वह रुक गया।

एक आधी खुली खिड़की से झाँका।

अंदर हॉल में— कतार में खड़ी लड़कियाँ दिखाई दीं।

डरी हुई।

चुप।

चिंटू की आँखें फैल गईं।

तभी एक गार्ड की आवाज़ आई—

“कौन है वहाँ?”

चिंटू झटके से पीछे हटा।

और अँधेरे में तेज़ी से भाग निकला।

पर अब— उसे समझ आ चुका था

प्रभु असल में कौन था।


— जारी —