Quotes by Arun V Deshpande in Bitesapp read free

Arun V Deshpande

Arun V Deshpande

@arunvdeshpande
(3.4m)

#श्रीरामनवमी -काव्यपुष्प💐

नमस्कार सर्वांना💐

शुभ संध्या💐

स्वलिखित रचना-
" खामोश कमरा"
******
खामोश कमरा
बहोत कुछ कहेगा ।

इस कमरे मे अगर
कोई है, बात करो,
नही है,
तो एक काम करो ।

कमरे मे जो तन्हाई है,
रंगहीन दिवारे है
उनकी खामोशी सुनो ।

वो अनकही कहानी,
सूनने का धैर्य रखो..
----------------------------------
स्वलिखित रचना- खामोश कमरा
कवी अरुण वि.देशपांडे-पुणे
----------------------------------------

Read More

hello friends
a thought to share-

"Consistency in everything
Is our steady progress 👍

ई दै-ज्योतिर्मय साहित्य- -०१फेब्रुवारी२०२६ रविवार अंकात प्रकाशित कविता-
******
वर्तमान
*********
चालतोय मी निरंतर
सावली कुठे दिसेना
भीषण एकाकी वाटेवर
सोबती कुणी भेटेना ।।

रस्ते सारे गजबजलेले
वाहने बेभान सुटलेले
जो तो आपल्या नादात
लुप्त झाला आपलेपणा ।।

बेगडी वैभवी जगात
बुजलेला साधा माणूस
तुच्छ नजरांचा झेलतो
उद्धटसा मुजोरपणा ।।

असे आहे वर्तमान हे
कालचे ते होते भले
बेभरोसी सारे उद्याला
होईल कसे,कोडे पडले ।।
******
कवी अरुण वि.देशपांडे-पुणे
9850177342
–----------------------------------------------

Read More

सण मकरसंक्रांत आला
सांगतो छान सर्वांला
नको कधी कुणाशी अबोला
तिळगुळ घ्या गोड बोला ।।

ई-दैनिक- ज्योतिर्मय -०४-०१-२०२६ अंकात प्रकाशित -आले नवं वर्ष आले
*******
सरले वर्ष जुनेरे झाले
नवे वर्ष हे जोशात आले

प्रेरणा देते नवीन वर्ष
नवी उमेद नि नवा हर्ष

संकल्प अधुरे जे राहिले
नव्याने मना ते आठवले

नव्याचे नऊ दिवस जसे
संकल्पांचे हाल होती तसे

नको मनाच्या कलाकलाने
वागावे ठरविल्या प्रमाणे

वेळ गेलेला तो येत नाही
पस्तावून उपयोग नाही

नव्या वर्षात नवा आरंभ
निश्चये करू कार्य प्रारंभ
******
कवी अरुण वि.देशपांडे-पुणे
९८५०१७७३४२

Read More

नमस्कार -साहित्य लीला पंढरी- २८-१२ अंकात प्रकाशित कविता
*******
कविता- माझे काहीच नुरले
-----------
एकटेपणा नकोसा
मनही कंटाळलेले
जो तो दंगला स्वतःत
माझे काहीच नुरले ।।

पाहिले तुजला सखे
मन क्षणात भुलले
केले स्वाधीन तुझ्या
माझे काहीच नुरले ।।

नजरेने पाहिले जग
किती अनोखे वाटले
तुझ्यात विरघळलो
माझे काहीच नुरले ।।

हवा हात सोबतीचा
सखे तूच तोही दिला
जग सारे बदलले
माझे काहीच नुरले ।।
---------------------------------
-अरुण वि.देशपांडे-पुणे
९८५०१७७३४२
-----------------------------------

Read More

रचना- सब भूल गये
------------------------------------------
अजीब बोझ मन पर होता है ,
जब उदासी घेर लेती है ।
बिते हुये दिनो की यादें सुहानी ,
आंखों को नम कर जाती है ।।

अपनो में रहना मन चाहता है ,
अब बात यह है की हर कोई ।
एक दूसरे से दूर रह कर ही ,
अपनापन जताना चाहता है ।।

परिवार का एक होना है जरूरी ,
आसान हो जाती है मुश्किलें ।
लड़ सकते है हम हर लड़ाई ,
दोस्तों मानो है बात बड़ी खरी ।।

लोग बदल गए, दिन बदल गए ,
नई सोच से सब कितने बदल गए ।
साथ देनेवाला संकट मे काम आए ,
बात यह आज सब क्यूं भूल गए ।।
----------------------------------------------
अरुण वि.देशपांडे-पुणे

Read More