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Vandna Sharma

Vandna Sharma

@drvandnasharma8596
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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
जल्दबाजी

मुझे बहुत जल्दबाजी रहती है
सब काम करने की,
किसी भी कार्य का तनाव
सहन नहीं कर पाती।
कल पर टालना भी
अच्छा नहीं लगता,
त्वरित प्रतिक्रिया देना
मेरा दोष है।

पर सोचती हूँ,
मरने में भी कहीं
जल्दबाजी की मैंने,
तो कई काम छूट जाएंगे करने से,
कुछ रूठ जाएंगे।

क्या ईश्वर देंगे
अनुमति मुझे,
रुके हुए कार्य
पूर्ण करने की?
गिनती की सांसें हैं,
जिम्मेदारियां अधिक,
और पूरे करने हैं
कुछ सपने।

जिम्मेदारियों और कर्तव्य के बीच
थोड़ा समय निकालती हूँ
अपने सपनों के लिए,
शायद इसीलिए
हड़बड़ी करती रहती हूँ कि
कोई अपना न छूट जाए,
कोई सपना न टूट जाए।

सबकी आस लगी होती है,
किसी की आस न टूट जाए,
दूसरों के आंसू पोंछते
खुद के गम भूल जाती हूँ।
कोई मुस्कराए मेरी वजह से,
बस इतना ही तो चाहती हूँ।
बस यही दोष है मेरा
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
Vandna.reporter@gmail.com

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पर्व विजयदशमी का (29/9/26)

पर्व विजयदशमी का
जीत सत्य की असत्य पर
जीत अच्छाई की बुराई पर
होता है मंचन रामलीला का
सदियों से चली आ रही परंपरा
लगते हैं मेले शाम को
खुश होते हैं बच्चे
पीटते हैं ताली

पर क्या हम सिखा पाए
अपने बच्चों को
कैसे प्राप्त करते हैं
विजय दस इंद्रियों पर
दस विकारों पर
क्या हम मार पाए
अपने अंदर का रावण
कर पाए किसी स्त्री की रक्षा
करना नारी का सम्मान
पर स्त्री है मां समान
है सार्थक तभी कोई परंपरा
जब जिएं आदर्शों को
उतारें व्यवहार में
वाणी-कर्म से दे सबको सम्मान
तभी होगी विजय धर्म की अधर्म पर
तभी होगा असली
पर्व विजयदशमी का
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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मैं अलबेली

मैं अलबेली
रहती अकेली
कुछ न कुछ लिखती हूँ
मन की बात कहती हूँ
मेरी कलम है मेरी सहेली
ये दुनिया है एक पहेली

छोटी-छोटी खुशियाँ मेरी
छोटी सी है दुनिया मेरी
ये प्रकृति है मेरी साथी
चुपके से पढ़ लेती है
मेरे मन की पाती

किसे सुनाऊँ अपनी कहानी
सब हैं व्यस्त, मैं बेली
मैं अलबेली
रहती अकेली

नन्हीं चिड़िया तुम दूर देश को जाना
मेरी व्यथा सुनाना
क्या तुम भी
नहीं बनोगी मेरी सहेली
मैं अलबेली
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता - मेरा गम

क्यों मेरे हिस्से में दुःख ही आया
क्यों भीड़ में भी खुद को तन्हा पाया
मेरी जिजीविषा तो देखो, जनाब
हर जहर पीकर खड़ी हो गई
मुश्किलें सहते-सहते बड़ी हो गई

जिंदगी के थपेड़ों ने छीन ली मुस्कान मेरी
कब मेरी राह, मेरी मंजिल से बड़ी हो गई
जब भी सुनाना चाहा हाल-ए-दिल
कोई ना मिला, दुनिया बेगानी हो गई
कि कलम से दोस्ती जब, लिख डाला
दर्द-ए-बयां जिंदगी सब, वाह-वाह

क्या लिखा है, क्या लिखा है
गम भी मेरा शायरी बना डाला
उसे भी जमाने ने कसौटी पर कसा है
आंसुओं की नदियों का हाथ है
मुझे पत्थर बनाने में
सभी दुःख दर्द का धन्यवाद है
मुझे मजबूत बनाने में

सही है इतनी बेरुखी दुनिया की
अब मैं खुश हूँ अपनी तन्हाई में
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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ये तो इंसाफ नहीं है
समानता ही रिश्ते में
नींव होती है रिश्ते की
एक भी ईंट लड़खड़ाए तो
ढह जायेगी इमारत रिश्ते की

तुम सुनाओ तो तुम सही
हम सुनाए तो हम गलत
तुम करो तो तुम सही
हम करे तो हम गलत

सच बोलना इतना ही पसंद है
तो सच सुनना भी सीखो
अपने अहं में सच से
नजरे चुराना है गलत

आईना सब सच बतलाता है
तो क्या आईना भी गलत
अपने तो अपने है, का रोना
कब तो रोओगे ए मुसाफिर
दगा गैर नहीं करते
वे होते है कुछ अपने ही गलत

भ्रम का पर्दा हटाना जरूरी है - भी गलत
कौन अपना है बताना जरूरी है - भी गलत

कब तक आस तकोगे किसी की
जिंदगी का सफर है, काँटो भरा
मंजिल को पाने, अकेले चलना जरूरी है

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रात की चांदनी हैरान है
कैसा ये व्यस्त इंसान है
तारो ने पूछा हंसकर ये
ऐ चांद आज क्यों अनजान है
लगे आज सारा जग परेशान है
इतना सुंदर है आसमान
झिलमिलाते तारे दीपमान है
नजर उठाकर देखे कोई तो
पलके बिछाए बैठा जहान है

चांद ने पूछा मानव से जब
क्यों दौड़ रहे बेचैन हो सब
एक पल ठहर कर देखो
मेरी चांदनी तारो संग वीरान है
क्यों हंसना भूल गए सब
जाने खुद से ही रूठ गए सब

रुककर बोला मानव तब
ऐ चांद ना है तेरी खता
एक मृग तृष्णा है ये जग
कौन सी दौड़ है ये, नहीं पता
यहां अपने भी सब
एक-दूजे से अनजान है

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कविता दिल खुश है अकेला
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

दिल खुश है अकेला
नहीं चाहिए कोई झमेला
जिन्हें कद्र नहीं हमारी
उनसे दूरी ही अच्छी
जो सुनना नहीं चाहते
उनके लिए चुप्पी ही अच्छी
व्यर्थ ऐसे रिश्तो के लिए
अपने शब्द, भाव देना
अपनी डायरी, कलम
ही सबसे अच्छी
ये नदिया, भी तो
बहते चुपचाप मस्त
पहाड़ भी रहते तने
रहते शांत खड़े
फूल भी देखो खिलते हैं
बिना किसी उम्मीद के
जिंदगी भले छोटी हो
जिंदगानी बड़ी जायेगी

कोई पढ़े ना पढ़े
कहानी लिखी जायेगी
बात निकली है तो
कहीं तो जरूर जायेगी
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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क्या करूँ

क्या करूँ
मैं क्या करूँ
जन्मदिन है मेरा
पर किसी को याद नहीं,
अभी तक किसी ने नहीं दी बधाई।

क्या सबको बताऊँ
क्या शोर मचाऊँ
क्या मैं किसी के लिए खास नहीं हूँ
क्या मुझसे किसी को प्यार नहीं है?

मैं तो सबका जन्मदिन रखती हूँ याद
सबसे पहले देती हूँ बधाई,
निस्वार्थ सबकी सहायता भी करती
कभी किसी से कोई उम्मीद भी नहीं करती।

फिर क्यों ये अकेलापन है
क्यों नहीं किसी को मेरी याद आई
क्या करना होता है
सबका चहेता बनने के लिए?

जरूरत बनना पड़ता है
जरूरत पड़ने पर ही
याद आती हूँ सबको।

इतना बुरा भी नहीं है अकेलापन
खुश हूँ मैं अपनी दुनिया में
ये प्रकृति साथ है
मेरे महादेव मेरे साथ हैं
मेरे सपने साथ हैं।

झूठे रिश्तों की राह तकनी ही क्यों
किसी से कोई उम्मीद रखनी ही क्यों
मैं और मेरे सपनों की दुनिया
काफी हैं खुश रहने के लिए

मैं खुश हूँ।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता आया शुभ दिन आया
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

आया शुभ दिन आया
गणेश चतुर्थी का दिन आया
बड़े प्यार से इस दिन
अपने घर बुलाते हैं बप्पा को
ढोल नगाड़े बजा होकर मगन
चहुं दिशा गूंजे नाचे गगन

फिर क्यूं करते हो विदा घर से
रहने दो घर में ही, सेवा करो दिल से

विघ्न हर्ता हरेंगे सारे क्लेश
पहले दिल से दो सम्मान उन्हें
मत करो विसर्जन
मत बनो भीड़ का हिस्सा

जहां गणपति रहते हैं
बिगड़े काम भी बन जाते हैं
सबके कष्ट वे हर लेते
रिद्धि सिद्धि सबको देते
भर देते धन धान्य से
सबके घर-भंडार

प्रथम पूज्यते गणेश
रहते जिस घर द्वार
धन धान्य की कमी न हो
सुखी रहे वो परिवार
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
गैरों में कब बदल जाते हैं रिश्ते
क्या जरूरत ही किसी
रिश्ते की नींव होती है

एक मां अपने नवजात शिशु के लिए
रातों को जागती है
अपने शरीर को अनदेखा करती है
खुद का निवाला भी
पहले बच्चे को खिलाती है
चोट उसे लगती है
दर्द मां को होता है

वही बच्चा बड़ा होने पर
मां को बोझ समझता है
आजादी में बाधा समझता है
मां का बोलना
अब चुभने लगता है
मां का साथ अब पराया लगता है

जो बेटा रो पड़ता था
एक पल को जो न दिखाई दे मां
उसे बरसों हो जाते हैं
मां से बोले
मां भी धैर्य रख लेती है
बेटे की खुशी में चुप्पी रख लेती है

क्यों मां-बेटे का रिश्ता
एक उम्र के बाद अनजाना हो जाता है
मां का दर्द नाटक
मां का प्यार पराया हो जाता है
क्यों होता है ऐसा

जिस शिद्दत से
पालते हैं औलाद को मां-बाप
बेटे क्यों नहीं रह पाते
साथ उनके उसी प्यार से

जिंदगी की मजबूरियां है ये
या फर्ज से लापरवाही
संवेदनहीनता है ये
या आंखों पर पड़ा पर्दा

मां-बाप का दर्द नहीं दिखता
बस उनका पैसा ही दिखता
संतान क्या सिर्फ लेने के लिए है
बुढ़ापे में देखभाल की उम्मीद
करना क्या बेईमानी है

क्यूं होता है ऐसा
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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