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धीरे-धीरे गाँव खत्म हो रहे हैं धीरे-धीरे गाँव खत्म हो रहे हैं गाँव अब शहर बनते जा रहे हैं, नीम के पेड़ की छाँव कहीं खो गई खो गया वो मटके का पानी एसी और फ्रिज ने अपनी जगह बना ली चौपाल अब खाली है खुला आँगन भी हो गया गायब नकल करते-करते शहर की वो सुकून वाला गाँव, अब शहर हो गया है वो अपनापन, वो भोलापन जो यादों में बसता था गाँव अब नहीं देता दिखाई अब नहीं मिलती गाँव में चारपाई वो कच्ची सड़क वो ताजी हवा वो अमिया के झूले वो गुड़ का स्वाद अब कोई आवाज न दे सुनाई बदल गई सब चाची ताई कैसी तरक्की कैसी आधुनिकता ये गाँव चली आई धीरे-धीरे गाँव, शहर बनते जा रहे हैं और फिर सुकून गाँव का ढूंढने कृत्रिम गाँव बसाए जा रहे हैं --- डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
अबकी बार मानसून नाराज है अबकी बार मानसून नाराज है रोज चकमा देकर चला जाता है एक झलक दिखाकर जाने कहाँ गायब हो जाता है गर्मी भी चिढ़कर सड़ी जा रही है चिप-चिप बहे पसीना हवा भी दे दगा कहीं और जा रही है आँखे थक गई बादलो को ढूंढते कब आयेगी बारिश दिल की धड़कन बढ़ी जा रही है बारिश करना भूल गए भगवान जी तभी तो गर्मी बढ़ी जा रही है कहीं लग रही A-C में आग कहीं नदियां सूखी जा रही है लगता है बादल भी खेल रहे हैं इंसान के साथ लुका-छुपी जैसे ही आस बने बारिश की हवा बादल उड़ा ले जा रही है तरक्की और आधुनिकता की कीमत ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही है कैसे कैसे तपते दिन-रात नींद सबकी उड़ी जा रही है। डॉ वंदना शर्मा
अहंकार की डूब एक सीख भरी कहानी एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ यात्रा के लिए निकला। थोड़ा कम पढ़ा-लिखा था। पर जिद्दी था, बात किसी की नहीं मानता था। करता अपने मन की था। हमेशा एक लाठी लेकर चलता था। चलते-चलते बीच में पड़ी एक नदिया। उसके साथ थे तीन बच्चे और उसकी घरवाली। लाठी को पानी में डालकर, लगा नापने गहराई। वो केवल पाँच फुट ही आई। बड़ा हिसाब उसने लगाया, सब परिवार जनों की लंबाई जोड़ 12 फुट पाया। सोचा उसने नदी तो पांच फुट गहरी है, और मेरे परिवार की औसत लंबाई 12 फुट है तो हम सब नदी पार कर सकते हैं, कोई नहीं डूबेगा। पहला बच्चा और दूसरा, दोनों दो फुट के थे। तीसरा तीन फुट का और उसकी घरवाली 5 फुट की थी। बोला सबसे - चलो नदी पार करते हैं, कोई नहीं डूबेगा। मैंने हिसाब लगा लिया है। घरवाली ने मना किया लेकिन वो नहीं माना। उसने अपनी पत्नी को मूर्ख बताकर हँसी उड़ाई उसकी। और सबको आदेश दिया कि चलो, कुछ नहीं होगा, मैंने हिसाब लगा लिया है। जैसे ही सब नदी पार करने लगे, सब डूब गए, वो भी डूबने वाला ही था। मदद के लिए चिल्ला रहा था। अपनी लाठी दिखाकर बचाओ-बचाओ, शोर मचा रहा था। उधर से एक मछुआरा जा रहा था, उसकी नजर पड़ी तो वह लाठी पकड़कर उसे बाहर खींच लाया। बाहर आकर रोने लगा, मछुआरे से बोला - "सारे डूब गए, मैं अकेला बच गया।"लेकिन एक बात समझ नहीं आती "हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों"। उसने सारी बात मछुआरे को बताई। उसने अपना सिर पीट लिया। और उस अकल के दुश्मन की उसी लाठी से की खूब पिटाई। और बोला अब समझ आया कुनबा क्यों डूबा।मछुआरा बोला - "तुम्हारे अहंकार ने सबको डुबोया। लाठी से गहराई नापी जाती है, जिंदगी नहीं। औसत निकालने से सब पार नहीं होते। जिसकी लंबाई कम थी, वो डूब गया।" वह व्यक्ति बहुत पछताया पर अब क्या हो सकता था। सब कुछ खो चुका था। "औसत से जिंदगी नहीं चलती... लाठी से नदी की गहराई नापी जा सकती है, रिश्तों की नहीं। अहंकार में लिया गया एक गलत हिसाब, पूरा परिवार ले डूबा। किसी की सुन लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। 🙏 #अहंकार #सीख #जीवनकासबक #FamilyMatters " डॉ वंदना शर्मा
हाय मोटापा व्यंग्य कविता कैसे कहूँ, ये दर्द ना जाने कोई बिना कुछ खाए ही मोटापा बढ़ता जाए बिन बुलाया मेहमान ये, बड़ा ढीठ है द्वार से ना जाए, हाय घर से ना जाए टिक्की, गोलगप्पे को जी भले ललचाए लगे खाने से इतना डर गले से ना निगला जाए जबसे थायराइड ने घेरा है बढ़ता कमर का घेरा है पतली-पतली मॉडल देख हाय शर्म बड़ी आए अरे किसी की नजर ही लग जाए बैरी मोटापा कैसे जाए कर लिए सारे जतन कड़वे काढ़े पीकर देख लिया योग करके भी देख लिया खडूस मोटापा फिर भी ना जाए आज सब परेशान हैं इस बैरी मोटापे से बच्चा, लड़का, बूढ़ा या हो कोई भी एक ही दर्द सबका आज हाय मोटापा कैसे जाए डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
चश्मा व्यंग्य कविता एक अनपढ़ ने सुना था चश्मा लगाकर सब पढ़ सकते हैं मन में लड्डू फूटा, सोचा मैं भी पढ़ सकता हूँ पहुँचा दुकान पर दिखाने लगा दुकानदार सभी चश्मे एक से बढ़कर एक सुन्दर-सुन्दर फ्रेम बारी-बारी से सब चेक कर चुका पर वो तो अनपढ़ था दिख तो सब रहा था छोटा-मोटा, आड़ा-तिरछा पर पढ़े कैसे ये ना आता झुंझलाकर दुकानदार ने पूछा भाई क्या तुम्हें पढ़ना आता अनपढ़ बोला, नहीं आता तभी तो दुकान पर आया तुमने ही ऐसा बोर्ड लगवाया मुझे मेरे दोस्त ने बताया सारे चश्मे बेकार तुम्हारे क्यूँ झूठा प्रचार फैलाया सुनकर दुकानदार का सिर चकराया गिरा जमीन पर, ना दे कुछ दिखाई अनपढ़ ने उसकी नाक पर चश्मा पहनाया और अपने घर को आया। डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
क्या हूँ मैं कविता क्या हूँ मैं? सिर्फ एक लड़की नहीं --- उससे भी ज्यादा एक बेटी एक बहन एक पत्नी एक माँ या एक शिक्षक क्या हूँ मैं --- ? एक कवि एक पत्रकार एक दार्शनिक एक यात्री एक गृहिणी या केवल एक इंसान क्या हूँ मैं --- ? कितना कठिन प्रश्न है यह खुद को जानना कितना कठिन है ?? मैं एक लड़की हूँ एक इंसान हूँ मानवीय कमजोरियों का होना स्वाभाविक है लेकिन मुझे चाहिए --- अपनी जमीन अपना आकाश अपने सपने अपनी उड़ान अपने होने का अर्थ और अपनी पहचान डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
दीवार में लगी खूंटी बड़ी उपयोगी होती है ऑफिस जाते हुए कार की चाबी तुरंत मिल जाती है टँगी घड़ी याद दिलाती है चलूँगी मैं भी साथ खूंटी पे टँगा पर्स इतराता है मेनगेट की चाबी इठलाती है सोचो एक दिन ये सब यथा स्थान ना मिले खूंटी पर तो क्या हंगामा हो जाना हो ऑफिस नौ बजे और 12 बज जाएँ चाबी ढूँढने में दीवार की खूंटी चिढ़ाए बार-बार क्यूँ नहीं किया उपयोग मेरा अब रोओ जार-जार डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
घर /फ्लैट जिंदगी में सब कुछ अपनी मर्जी से नहीं मिलता। फिर भी 'एक घर' की चाहत तो सभी की होती है। पर हाय! ये कैसा मजाक, जिंदगी का, दिल्ली में रहने की चाहत! यह सपना भी पुरा नहीं हो सकता। दिल्ली में जनसंख्या अधिक है, जमीन कम है। आज से दस साल पहले जिसने अपनी जमीन खरीदकर अपना घर बना लिया, बड़ा किस्मतवाला था। आज के समय में तो घर के नाम पर मिलता है एक फ्लैट, उसमें भी बस अन्दर-दीवारें फर्श अपना, अगर वो फ्लैट थर्ड या फोर्थ फ्लोर पर है तो उसमें पहुँचने का रास्ता मतलब जीना शेयरिंग होता है। जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो कितने गर्व से दोस्तों को बताते थे वो जो बड़ा सा काला चैनल वाला गेट है वो है हमारा घर। कितना बड़ा था हमारा घर, द्वार भी अपना, फर्श भी अपना, जीना भी अपना, आंगन भी अपना। 'आंगन' शब्द आने वाली पीढ़ी के लिए आश्चर्य होगा, इतिहास बन गया होगा। दो छोटे कमरों का 45 गज का फ्लैट भी चालीस लाख में मिलता है दिल्ली में। 30 गज के जमीन पर चार-चार फ्लोर बने हुए हैं यहाँ और चारों फ्लोर पर अलग-अलग परिवार रहते हैं। प्रथम तल वाले को दूसरे, तीसरे तल निवासी की कोई जानकारी नहीं। पड़ोसी शब्द भी अब सिर्फ शब्दकोश में ही मिलेगा। कहते हैं मुंबई का तो इससे भी बुरा हाल है। एक कमरे को चार-चार अजनबी साझा करते हैं। मजे की बात ये है कि इन चारों से अलग-अलग अपने रूममेट का नाम या जानकारी पूछी जाए तो बता नहीं पाएंगे। ये कैसा समय है? ये आधुनिकता और तरक्की के नाम पर हम कहाँ आ गए? बहुत कुछ पीछे छूट गया है। छूट गया है अपना घर, 'परिवार', पड़ोसी, रिश्तेदार, दोस्त। घर के नाम पर एक डिब्बा मिलता है मर-मर कर कमाने को, रात को सोने को। कभी-कभी सोच हो जाती आज महानगरीय इंसान की, हैरान हूँ सोचकर क्या जिंदगी है ये? 'घर' शब्द शब्द-शब्द ही रह गया, अर्थ ना जाने कहाँ खो गया। सब भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं जिंदगी की दौड़ में, एक अच्छी सुविधाजनक जिंदगी जीने के लिए। पर क्या ये जी रहे हैं ना उन्हें सुबह का पता, ना शाम का एहसास। आगे कौन-पीछे कौन, कुछ नहीं खबर बस दौड़ रहे, ना मंजिल का पता, ना रास्तों का, बस दौड़ रहे हैं। पहले घरों की नेमप्लेट पर लिखा होता था - 'उपाध्याय निवास', 'शर्मा निवास', 'वर्मा हाउस', 'लक्ष्मी निवास' आदि-आदि। आज नेमप्लेट नम्बर प्लेट में बदल गई। एक ही बिल्डिंग में पाँच-पाँच परिवार रहते हैं यहाँ दिल्ली में, मुंबई में तो शायद हजारों परिवार एक ही बिल्डिंग में रहते हैं। यहाँ किसी इंसान का ठिकाना कमरा नम्बर या फ्लैट नम्बर हो गया है। जिस बिल्डिंग में मैं रहती हूँ थर्ड फ्लोर पर, उसी के फोर्थ फ्लोर पर तीन प्राणियों की एक फैमिली रहती है। पति-पत्नी और उनका बेटा। तीनों ही दिनभर घर से बाहर रहते हैं। माफ कीजिए घर नहीं फ्लैट। पति सुबह आठ बजे घर से ऑफिस के लिए निकलता है, देर रात्रि 12-1 बजे पहुँचता है, कभी खाना खाता है, कभी नहीं खाता। थका-हारा सो जाता है अगली सुबह ऑफिस पहुँचने के लिए। महीने के दो लाख कमाता है पर समय नहीं है पलभर ठहरने के लिए। पत्नी भी ऑफिस जाती है आठ बजे और देर रात घर आती है आठ बजे तक। बच्चा 8 बजे प्रातः स्कूल जाता है वो भी स्कूल और ट्यूशन व स्पोर्ट्स से फ्री होकर शाम 8 बजे घर पहुँचता है। सिर्फ रविवार को तीनों मिलते हैं एक साथ। उसमें भी एक दूसरे के लिए समय कम ही होता है। कभी मूवी चले गए, मॉल चले गए या घर में ही सो रहे हैं, नींद पूरी कर रहे हैं। तो पाठकगण आप ही बताइए क्या जिंदगी है ये? यह भागदौड़ किसलिए? क्या पाया हमने और क्या खो रहे हैं, क्या खो गया हमसे। जरूर बताइएगा ये कहाँ आ गए हम चलते-चलते - ---
बाल कहानी चूहे की टोपी एक था चूहा। नाम था उसका चींची। एक दिन वह सैर को जा रहा था, उसे एक पेड़ के नीचे कुछ चमकीला-सा दिखाई दिया। वह दौड़कर पहुँचा वहाँ, देखा एक सुंदर लाल कपड़ा था। जो बहुत चमक रहा था। तभी वह खुशी से उछला और बोला - "अरे वाह कितना सुंदर कपड़ा है। इसकी तो मैं टोपी सिलवाऊँगा। शादी में जाऊँगा। सेल्फी लूँगा। गरम-गरम रसगुल्ले खाऊँगा। वाउ कितना मजा आएगा! यम्मी-यम्मी।" ऐसा सोचकर उसने लाल कपड़े को उठाया और उलट-पुलटकर देखने लगा। टोपी सिलाने के लिए चाहिए एक दर्जी। चींची गया दर्जी के पास। पैसे तो थे नहीं उसके पास। दर्जी ने उसकी टोपी सिलने को मना कर दिया - "जाओ पहले पैसे लाओ, ऐसे नहीं सिलूँगा।" चूहा बहुत दुखी हुआ और कुछ सोचने लगा। उसे एक तरकीब सूझी। वो फिर से दर्जी के पास गया और बोला - "पुलिस को बुलाऊँगा, पिटाई करवाऊँगा नहीं तो टोपी सिल दो भैया, वरना जेल भिजवाऊँगा।" दर्जी डर जाता है। उसकी टोपी सिल देता है। टोपी पहनकर चींची बहुत खुश हुआ। उसने सोचा अगर इस टोपी में सितारे भी होते तो मजा आ जाता। चूहा गया सितारे लगवाने। पहले तो सितारे वाले ने मना किया, फिर चूहे ने वही धमकी उसे भी दी - "पुलिस को बुलाऊँगा, पिटाई करवाऊँगा नहीं तो सितारे लगा दो भैया, वरना जेल भिजवाऊँगा।" सितारे वाला डरकर जल्दी से सितारे लगा देता है। सितारे वाली टोपी पहनकर चूहा बहुत खुश हुआ। सोचा चलो अब पार्टी में चलते है। चूहा पहुँचा मंडप में लेकिन ये क्या? दरबान अन्दर ना जाने दे। उसने फिर वही धमकी दरबान को दी - "पुलिस को बुलाऊँगा, पिटाई करवाऊँगा, नहीं तो अन्दर जाने दो भैया, वरना जेल भिजवाऊँगा।" दरबान भी डर जाता है। वो चूहे को अन्दर जाने देता है। चूहा अपनी समझदारी पर बहुत खुश हुआ। वो इठलाकर अकड़कर चलने लगा। कभी इधर फुदकता, कभी उधर फुदकता, शोर मचाता चूहा चला जा रहा था अपनी धुन में, रास्ते को बना मन ही मन में। तभी अचानक उसका पैर फिसला, जा गिरा वो नाली में। हुई उसकी बहुत जग हँसाई और खिंचाई। टोपी भी गिर गई नाली में। अपनी टोपी को देख चूहा रोने लगा। तभी वहाँ आई एक नन्हीं चुहिया बोली मत रो भैया। जो हो गया, होने दो, आँसू पोंछो हँसो तो, यह लो खाओ रसमलाई, अब तो थोड़ा हँस दो भैया। आओ मिलकर करें हम ता-थैया, ता-थैया। डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
'अंतिम विदाई' कविता 'अंतिम विदाई' शब्द सुनते ही रूह काँप जाती है सोचकर। कोई किसी को कितना ही प्यारा क्यों ना हो, लेकिन शरीर के मरते ही भाव बदल जाते हैं सबके। नाम गुम हो जाता है, जल्दी रहती है सबको क्रिया-कर्म निपटाने की। 'बॉडी' को हाथ लगाने से भी डरते हैं लोग। जीते जी तो समय दिया नहीं, मरने के बाद भी जल्दबाजी करते हैं सभी अपने भी। वो जमाना भी याद आता है जब जुट जाता था खास-ओ-आम, सारा मोहल्ला अंतिम विदाई में। आज अपने भी नहीं आते, वीडियो कॉल से दर्शन करते दो आँसू बहाते और भूल जाते। समय सबका आना है, एक दिन सबको जाना है, फिर भी घमंड लोगों को। यह मोह माया सब यहीं रह जाना है। --- डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
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