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Ashish jain

Ashish jain

@jainashish0014


आते हुए रस्ते
से मैंने पुछा
घर कब आएगा
यह सुन रास्ता
मंद सी मुस्कान
छोड़ कर यह बोला
हे नव राही
तूने की है शुरुआत
अभी ही थक गया
तू इतनी जल्दी
मै जाने कब से
बढ़ता ही जा रहा हूँ
चलता ही जा रहा हूँ
कितने ही रहगुजर
करते है साथ
चलने का वादा
फिर जाने कहाँ
हो जाते ग़ुम
और मै ग़ुम सुम जान न सका अभी तक
"घर कब आएगा "
जब आ जायेगा
तब थम कर
कह दूंगा ऐ राही
तेरा आ गया
कोई दूसरा मिलेगा
तब शायद
मेरा भी आ जायेगा

आशीष जैन.

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मै केवल
पढता हूँ
कविता को
कविता जो
मेरे जीवन
का सच
कहती है
मै डरता
था जो
भी कहने
में वो अव
केवल मेरी
कविता कहती है
रजनी कान्त आशीष जैन
और अंत में (श्रीचंद)

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काश हमे कोई अपना बोले
ऐ काश कोई मेरे दिल को छूले
कोई काश कर शैतानी
कोई मेरी पलकों में झुला झूले

मेरे सपने भी किसी के बनके
काश की कोई थोड़ा नैनों को धोले
मेरी भी यादे किसी को कर्जा बनके
रात का अपना चैन भी खो दे

काश कभी जब थक के लौटूं
मेरे सर से पसीना कोई पोछे
काश हमे कोई अपना बोले
काश कोई मेरे दिल को छूले

आशीष जैन (श्रीचंद)

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कोई खूबसूरती नहीं
इन टूटे शब्दों में
खूबसूरत हे ये एहसास
जो बनकर दिलो में
छाप बना जाते जेसे
हो कोई बजाता साज
इसी साज को मै
बना देता हूँ केवल ऐ दोस्त
बेदर्द दिल के दर्द की आवाज़

आशीष जैन (श्रीचंद)

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पानी और जीवन
जाने कितने ही
आकार बदलता है
जब ये आसमान
से आता है तो
कई प्यासे मन
को खुशियाँ दे
कर जाता है
कभी ये पिघल
कर बह जाता हे
जब यह फुब्बारे
में सजता है
तो छोटी बूंदों
सा चमकता है
और जब जाता
है तो भाप सा
सूरज की किरणों
जा खोता है
गम गिन माहौल
पे यह तड़प सा
काला बदल बन
मंडराता है पर
जब ये बरसता है
तो खुशहाली की
खुसबूदार लता सी
बन कर फ़ैल जाता
जीवन और पानी
यही कहानी
कितनो को तरसाता
हा कितनो को तडपता
पर दुःख और खुशियाँ
सच ये हमे बरस
के दिखता है

आशीष जैन (श्रीचंद)

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जिस भी ने
जीवन मे कभी
भी कोई भी
गलती नहीं की
समझ लेना चाहिए
वो इंसान नहीं भेड़
है क्यों की
उसने खुद कुछ
नया नहीं किया
बस भेड़ की तरह
लाइन में पीछे
ही चलता चला
इंसा तो वो है
जो खुद कुछ करे
और जिस के पीछे
ये भेड़ रुपी इंसा चले

आशीष जैन (श्रीचंद)

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कर लो चाहे पूजा एक हज़ार
कहता यही मै बार बार
माँ बाप को जो ठुकराया बुढ़ापे में
चोट खायेगा दिन में
सौ सौ बार
माँ बाप तो गहना है
जिसे बचपन में
तूने पहना है
पत्नी के आते ही
ये गहना तू निकल
पड़ा बेचने थोड़ी दौलत
पाते ही,
क्या करेगा
इस सब का जब
तेरे माँ बाप के आखों
से टपक कर निकली
है बद्दुआ कहीं का नहीं
रहेगा तू कोई नहीं पूछेगा....

जय जिनेन्द्र
आशीष जैन (श्रीचंद)

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बेटा मेरा जब
लिपटता है बांहों में
जीवन पूरा जी
लेता हूँ अब कोई
तमन्ना नहीं है मेरी
उसे देख आँखों से
खुशियों की शराब
पी लेता हूँ
उसकी किलकारी
ताकत है मेरी
इस प्यारी चित्कार को
समझ पूरा जीवन
पी लेता हूँ
रोता है जब तो आँखे
भर आती है
उसको ख़ुशी देने को
खुद ख़ुशी भी कर लेता हूँ
सोता है रात जब
साथ मेरे साथ ही
सांसे लेता हूँ
बन कर ठंडी हवा का
झोका सा उसे बहो में भर
लेता हूँ

आशीष जैन (श्रीचंद)

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उसकी आँखों में खौफ
-सा बिखरा पड़ा है
उसके हाथो में खिलोने
है बच्चो के पर
पसीना कहानी कहता है
के किसी के जाने का
उसके कांपते होठो
पर एक अजीब सी
दहशत है इस बेकार
की महंगाई ने तोड़ दी
है उसकी कमर बेटा
तो अब रहा नहीं
उपर से सता रही
चिंता बेटी के जाने की
वो पड़ी हुई है अस्पताल
में दवा का खर्चा नहीं
है देने को लगता है
ये जेसे अभी देगा रो
बेचता है खुशियाँ बच्चो
को पर खुद की खुशी न
जुटा पाया शाम को घर
लौटा वापस तो देखा
बेटा रहा नहीं अब घर में
बेटी को भी न ये बचा पाया

आशीष जैन (श्रीचंद)

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अब्ज ज्यू बजता
है नभ मे
अधर धरा का
लगता सिन्दूरी
खग की उत्पत्ति से
नभ मे बहती अचल
समीर जिसके उत्तर
से अब्धि की धरा
लेती मधु हिलोर
खग खग की चीत्कार
से उत्पन्न राग से
गता कण कण
अमृत गीतक
उत्सर्ग धरा का
गाती सारंग
ज्यो ज्यो अर्क ताप
बरसाता दहकती
भू माँ की सुगंध से
भर जाता
ज्यो ज्यो अर्क ताप बरसाता

आशीष जैन (श्रीचंद जी)

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