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*पुरुषार्थ का उद्घोष* तंद्रा तज कर जो जाग उठा, वह अभ्युत्थान का राही है, भाग्य-लेख को जो मिटा सके, वही कर्म का साक्षी है। मृग-मरीचिका के पीछे वह, कभी न अपना समय गँवाता, श्रम-सीकर से अपनी वह, अमिट नियति लिख जाता। बाधाओं का संवर्तक बन, जो गिरिवर को भी झुकाता है, शून्य से जो सृजन करे, वही विश्वकर्मा कहलाता है। कर्मठता की उस वेदी पर, जब 'आशीष' का दीप जलता है, तब भाग्य का वह मौन पत्थर भी, संकल्प-ताप से पिघलता है। न थकता है वह काल-चक्र से, न प्रारब्ध का रोना रोता, अथक साधना के बीजों को, वह मरुथल में भी है बोता। अतुलित बल का वह पुंज है, संकल्प जिसका अविचल है, तपस्या की उस पावन भट्टी में, तपकर बनता वह कुंदन है। Adv. आशीष जैन 7055301422
*सोच की गरीबी* धन का निर्धन संघर्ष चुनता, भाग्य को भी मोड़ देता है, हाथों की मेहनत से अपनी, वह बरकत जोड़ लेता है। कोई दिखाए रास्ता तो, वह सुनता और करता है, छोटा ही सही पर आगे बढ़ने का, वह साहस हरदम भरता है। पर जिसका मन ही निर्धन है, वह कभी न आगे बढ़ता है, अहंकार की संकरी गलियों में, वह हर पल खुद से लड़ता है। जैसे कुएँ का मेंढक समझे, बस यही जगत की सीमा है, बाहर का सूरज क्या जाने? उसकी सोच का दीया धीमा है। वह दूसरों को मानसिक सुख, कभी न दे पाता है, कड़वे बोल और रूखी बातों से, बस दिल ही दुखाता है। मनमानी उसकी ऐसी जैसे, जग का भार उसी पर हो, दिखावा ऐसा करता जैसे, सबसे बड़ा वही घर हो। धन की गरीबी मिट जाती है, कोशिश के पैमानों से, पर सोच की गरीबी हारती है, केवल अपने अभिमानों से। जो झुकता है वह पाता है, जो अकड़ा है वह ढहता है, कुएँ का वासी अंत समय तक, बस कुएँ में ही रहता है। Adv. आशीष जैन 7055301422
शीर्षक: वतन का रखवाला "वतन की गोद में हम सब ने पायी एक जन्नत है, शहादत और इबादत की ये पावन सी विरासत है। लहू देकर जो सींचें गुलसिताँ को वो ही 'आशीष' हैं, तिरंगे की बुलंदी ही हमारी सबसे बड़ी चाहत है।" "जहाँ की गोद में हमने सुनहरी शाम देखी है, जहाँ की मिट्टी में अपनी सुबह की शान देखी है। वो जिसके ज़र्रे-ज़र्रे में वफ़ा का नूर बहता है, उसी आग़ोश में हमने अपनी पहचान देखी है। हिमालय सर उठा कर जिसके पहरे को खड़ा रहता, समंदर पाँव धोने को जिसे बेताब है रहता। जहाँ की सरज़मीं हर हाल में सरसब्ज़ रहती है, वहाँ का बच्चा-बच्चा बस यही पैगाम है कहता। लहू का आख़िरी कतरा वतन के नाम कर देंगे, सजा कर सर पे खुशियों का नया ईनाम कर देंगे। खड़ा हूँ सरहदों पर मैं दुआ का एक 'आशीष' बनकर, तिरंगे की हिफाज़त में हम अपनी जान कर देंगे।" क्या आप इस नज़्म में शहीदों की गाथा जोड़ना चाहेंगे या इसे नौजवानों के जोश पर ही केंद्रित रखना चाहेंगे? "शहीदों की इबादत से ये हिंदुस्तान ज़िंदा है, हवाओं में वफ़ा का आज भी अरमान ज़िंदा है। गए जो खेल कर जानों पे वो लौटे नहीं लेकिन, उन्हीं के दम से अपनी कौम का सम्मान ज़िंदा है। वो जब निकले थे घर से, सर पे बांधा था कफ़न अपना, वतन की आबरू पर वार दिया खिलता चमन अपना। किसी की मांग का सिंदूर, किसी की गोद सूनी थी, मगर आँच आने न दी, माँ का बचा रखा बदन अपना। लिखा इतिहास को जिसने अपने सुर्ख लहू से ही, बचाया मुल्क को जिसने हर एक दुश्मन और डूह से ही। खड़ा है आज भी सरहद पे जो इक 'आशीष' बनकर, निकाली जां है जिसने आज़ादी की रूह से ही। सलामत है अगर ये मुल्क तो उन जांबाज़ वीरों से, जिन्होंने जंग जीती मौत की तीखी लकीरों से। झुकेंगे हम न तब तक, जब तलक है जोश बाक़ी, आज़ाद हैं हम और रहेंगे आज़ाद जंजीरों से।" उबलता खून रग में हो, तो फिर तूफ़ान आता है, वतन के वास्ते मरना, बड़ा अहसान आता है। न पूछो हाल वीरों का, कि जब वो जंग लड़ते हैं, तो काँपे थर-थर दुश्मन, मौत का सामान आता है। हिमालय की बुलंदी सा, इरादा ठोस रखते हैं, उजाले के लिए हम, जुगनुओं का रोष रखते हैं। सियाचीन की बर्फ़ों में, जहाँ सांसें भी जम जाएं, वहाँ भी हम वतन की भक्ति का मदहोश रखते हैं। ललकारें जब गूँजती हैं, गगन भी काँप जाता है, शहीदों के लहू से ही, चमन ये मुस्कुराता है। खड़ा है सरहदों पर जो बन कर एक 'आशीष', उसी की जाँ-निसारी से तिरंगा जगमगाता है। चढ़ा दो शीश चरणों में, ये मिट्टी मान माँगती है, पिला दो खून दुश्मन को, ये धरती दान माँगती है। उठा लो हाथ में परचम, दिखा दो अपनी ताक़त को, हुकूमत हिन्द की अब, विश्व में पहचान माँगती है। Adv. आशीष जैन 7055301422
शनि निंदा स्तुति रे निर्दयी, रे क्रूर दृष्टि, तू न्याय का कैसा ढोंग रचाए? दीन-हीन को कुचल रहा, और पापियों को मौज दिखाए। कौए जैसा रूप तेरा, और मन में कालिख छाई है, मेरी हँसती-खेलती दुनिया, तूने नरक बनाई है। चलता तू कछुए की चाल, पर दुख देने में बड़ा तेज है, मेरे पसीने की कमाई पर, बिछाता काँटों की सेज है। क्या बिगाड़ा था तेरा मैंने, जो इतनी कठोर सजा दी? मेरे सपनों की अर्थी तूने, अपनों के हाथों सजवा दी। ले दे ले भर-भर गालियाँ, जो तेरे मुख पर मैं मारूँ, तेरी टेढ़ी नज़र के आगे, अब मैं कभी न हारूँ। उच्च का होकर बैठा है, पर कर्म तेरे सब नीच हैं, इंसानियत और पत्थर में, बस तू ही खड़ा बीच है। अब छोड़ पीछा मेरा, या फिर काल बनकर आ जा, या तो मेरा भाग्य बदल, या मेरा अस्तित्व खा जा। थक गया हूँ मैं लड़ते-लड़ते, अब धैर्य मेरा टूटा है, तुझ जैसे निर्दयी देव से, अब मेरा नाता छूटा है। Adv. आशीष जैन 7055301422 इसके लाभ बहुत है शनि की निंदा जरूर करें जब शनि आपको परेशान करता है तब
॥ भगवान बाहुबली स्तुति ॥ दोहा प्रथम तीर्थंकर आदिप्रभु, ऋषभदेव के लाल। त्याग मूर्ति बाहुबली, नमो-नमो हर काल॥ अडिग खड़े गोमटेश्वर, पर्वत शिखर विशाल। शांत सौम्य मुखमुद्रा, आशीष झुकाए भाल॥ स्तुति (लयबद्ध गायन हेतु) अचल खड़े तुम वन के भीतर, वर्ष बीत गए भारी, तन पर लिपटी बेलें अद्भुत, महिमा तुम्हारी न्यारी। पैर जमे हैं पृथ्वी के भीतर, मन है अम्बर पार, वंदन बारम्बार प्रभुवर, वंदन बारम्बार ॥ १ ॥ काम-क्रोध और मान-मोह को, क्षण में तुमने त्यागा, चक्रवर्ती का सुख तज करके, संयम पथ पर जागा। भरत चक्र के द्वंद्व को जीता, फिर भी मन वैराग्य, धन्य हुआ वह स्वर्ण-कलश, और धन्य हुआ सौभाग्य ॥ २ ॥ सर्प लपेटे देह खड़ी है, पक्षी नीड़ बनाते, मौन तपस्या देख तुम्हारी, देव सुमन बरसाते। ना हिलते ना डुलते स्वामी, योग-अग्नि उजियारी, बाहुबली तुम संकट-भंजन, मंगल-रूप अविकारी ॥ ३ ॥ केवलज्ञान की ज्योति जली जब, मिटा तिमिर का साया, सिद्ध-शिला पर जा विराजे, छोड़ मोह की माया। हम भी आए शरण तुम्हारी, दे दो विमल स्वभाव,आशीष मांगे मुक्ति पद, कर दो प्रभु निस्तार ॥ ४ ॥ दोहा विंध्यगिरि की गोद में, खड्गासन भगवान। बाहुबली के चरणों में, आशीष करे प्रणाम॥
॥ अकेले योद्धा का संकल्प ॥ एक ही संभालता संस्कार को, एक ही बचाया करता धर्म को। बाकी सब तो मोह की नींद में, गहरी चादर तान सोया करते। जब-जब उठीं उंगलियाँ रक्षक की नीयत पर, जब-जब लगे लांछन पवित्र सी सीरत पर। दुनिया की भीड़ बस शोर मचाया करती है, बस उसके बारे में यही सब कहा करते। कहते— "कब्जा लिया मंदिर है क्या?" कैसी विडंबना, कैसा ये झमेला है। जो बचा रहा है नींव को ढहने से हर पल, वो अपनी ही दुनिया में आज कतई अकेला है। क्या भूल है उसकी जो बचा रहा हर धूल है? जो कांटों के बीच खिला रहा आस्था का फूल है। पर समाज तो बस तमाशा देखने का शौकीन है, उसे रक्षक की मेहनत भी लगती कतई फिजूल है। वो मंदिर को ईंट नहीं, सम्मान मानता है, वो हर गिरते पत्थर का दर्द पहचानता है। बाकी सब तो बस अपनी ढपली बजाया करते, पर वो अकेला ही धर्म की लाज बचाना जानता है।
शीर्षक: "श्रमण चर्या का बदलता चोला" ब्रह्म मुहूर्त में जो उठकर, आत्म-ध्यान में लीन थे, जैन आगम के वे साधक, संयम में प्रवीण थे। पर आज देख कर ये दृश्य, मन भारी हो जाता है, जब साधु वेश में कोई, सुबह नाश्ता चबाता है। कहाँ गई वह 'नवकारसी', कहाँ गया वह त्याग? चाय की चुस्की में अब, जाग रहा अनुराग। दोपहर की गोचरी तो बस, एक रस्म बन गई है, साधु की वो तप-तपस्या, अब तो कहीं खो गई है। सूरज कहता - "सावधान! अब विदा मुझे तुम होने दो", चौ विहार का समय हुआ, अब जठराग्नि को सोने दो। मगर शाम के पाँच बजे भी, जो भोजन की आस रखे, वो क्या खाक मुमुक्षु होगा, जो जीभ पर ना लगाम रखे। चामुंडराय ने क्या सोचा था, क्या ऐसे होंगे निर्ग्रंथ? क्या भोग-विलास की राह चलेगा, ये पावन जैन पंथ? श्वेत वस्त्र तो धारण किए, पर मन में भारी लालसा है, ये श्रमण धर्म है या बस, सुविधानुसार एक तमाशा है? तप की अग्नि ठंडी पड़ी, इंद्रियों का जोर बढ़ा, साधुता की बलि चढ़ाकर, स्वाद का चस्का खूब बढ़ा। आशीष! देख ये विडंबना, रक्षक ही भक्षक बनता है, शास्त्रों का शासन रोता है, जब संयम रोज मरता है। Adv.आशीष जैन 7055301422
लाइफ की करप्ट विंडो मेरे मदरबोर्ड (ईश्वर) ने जब, ये पुर्जा नया बनाया, ठोक-बजाकर हार्ड डिस्क (आत्मा) का, एक पीस लगाया। सन् दो हजार छह की वो, 'विंडो एक्स पी' वाली रात थी, नया सिस्टम, नया जोश, और खुशियों की शुरुआत थी। सीडी-रोम (मम्मी-पापा) ने इसमें, संस्कार का सॉफ्टवेयर भरा, एंटीवायरस बनकर गुरु आए, ताकि सिस्टम रहे खरा। पर हाय रे किस्मत! कुछ गलत दोस्तों के 'वायरस' आ गए, कुछ गर्लफ्रेंड के 'मैलवेयर', मेरा सारा रैम (RAM) खा गए। इंटरनेट से फाइल अटैच हुई, जिसे शादी कहते हैं, अपडेट हुआ एंटीवायरस (नौकरी), अब हम ऑफिस में रहते हैं। कॉपी-पेस्ट के चक्कर में, एक नई फाइल (बच्चा) डाउनलोड हुई, खुशियाँ तो बहुत मिलीं, पर मेमोरी थोड़ी ओवरलोड हुई। अब महँगाई की डायन ने, फाइलें ऐसी करप्ट कीं, सिस्टम होने लगा हैंग, और विंडो ही इरप्ट (Erupt) की। अब दुनिया जब भी पूछती है— "आशीष भाई, क्या हाल है?" तो मेरा सॉफ्टवेयर बस एक ही, एरर कोड (Error Code) उगलता है: "माफ़ करना भाई, 'योर पासवर्ड इज़ इनकरेक्ट',मेरा दिल अब हैग है, और दिमाग डिसकनेक्ट!"
शीर्षक: बेलन और ब्रह्मांड का युद्ध सुबह सवेरे गरम चाय की, माँग जो मैंने कर दी, पत्नी ने गुस्से की ज्वाला, आँखों में अपनी भर दी। बोली— "चाय चाहिए या फिर, अपना सिर फुड़वाना है? आज सफाई का दिन है, या फिर बहाना बनाना है?" लड़ाई ऐसी छिड़ गई जैसे, सरहद पर घमासान हो, वो थी सुलगती झाँसी की रानी, मैं डरा हुआ इंसान हो। मैंने कहा— "ओ प्रिये! ज़रा तो, रहम इस दिल पर खाओ," वो बोली— "चाय छोड़ो, पहले ये मकड़ी का जाला हटाओ!" वो उठी तो लगा कि कोई, भारी तूफ़ान आएगा, बेलन हाथ में देख लगा, मेरा भूगोल बदल जाएगा। मैंने आवाज़ उठाई तो वो, 'सुनामी' बनकर आई, एक घंटे तक फिर घर में, मेरी 'सर्जिकल स्ट्राइक' हुई। मैदान-ए-जंग में खड़ा मैं, बस आहें भरता रहा, अपनी ही शादी के फैसले पर, मन ही मन मरता रहा। आशीष! अब हालत ऐसी है कि, कोना ढूँढ के बैठा हूँ, शेर था कल तक घर का, आज भीगी बिल्ली बना बैठा हूँ। अब वो उस कमरे में बैठी, 'मौन व्रत' का तीर चलाती है, मैं इस कमरे में बैठा, जैसे सज़ा-ए-मौत काटता हूँ। दोस्ती करने जाऊं तो, वो 'नागपाश' सी डसती है, और मेरी इस हालत पर, मोहल्ले की कामवाली हँसती है! Adv. आशीष जैन 7055301422
कविता: दरिया का फासला नदी के उस किनारे पर, वो बनकर आस बैठी है, दबाकर दिल में अरमानों की, मीठी प्यास बैठी है। इधर हम हैं कि सूनी रेत पर, चुपचाप बैठे हैं, लगाकर ज़ख्म लहरों का, कोई इतिहास बैठे हैं। हमारी कश्ती तो उस पार, जाने से ही रूठ गई,मझधार में ही किस्मत की, वो डोरी टूट गई।जो लेकर जाती उस साहिल पे, वो कश्ती ही डूब चुकी,मिलन की हर हसीं ख़्वाहिश, दरिया में ही ऊब चुकी। न आवाज़ वहाँ पहुँचे, न कोई राह दिखती है, तड़प ये फासले वाली, न कागज़ पर लिखी जाती है। वो सुध-बुध खोके बैठी है, हम आहें भरके बैठे हैं, दबे अरमान सीने में, कई पत्थर से बैठे हैं। कैसे हो बात अब उनसे, कि दरिया बीच में गहरा,लगा है बेबसी का आज, यादों पर कड़ा पहरा।वो बस एक अक्स जैसी है, जो लहरों पर चमकती है,मगर छूने को बढ़ते हैं, तो ये दुनिया धमकती है। नदी बहती ही जाती है, जुदाई को जताने को, कोई 'आशीष' तो दे दे, इस टूटे आशियाने को। वो उस तट पर, हम इस तट पर, बस निहारा करते हैं, बिना पतवार के हम, उम्र सारा गुजारा करते हैं। Adv.आशीष जैन 7055301422
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