Hindi Quote in Poem by Ashish jain

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*सोच की गरीबी*

धन का निर्धन संघर्ष चुनता, भाग्य को भी मोड़ देता है,
हाथों की मेहनत से अपनी, वह बरकत जोड़ लेता है।
कोई दिखाए रास्ता तो, वह सुनता और करता है,
छोटा ही सही पर आगे बढ़ने का, वह साहस हरदम भरता है।

पर जिसका मन ही निर्धन है, वह कभी न आगे बढ़ता है,
अहंकार की संकरी गलियों में, वह हर पल खुद से लड़ता है।
जैसे कुएँ का मेंढक समझे, बस यही जगत की सीमा है,
बाहर का सूरज क्या जाने? उसकी सोच का दीया धीमा है।

वह दूसरों को मानसिक सुख, कभी न दे पाता है,
कड़वे बोल और रूखी बातों से, बस दिल ही दुखाता है।
मनमानी उसकी ऐसी जैसे, जग का भार उसी पर हो,
दिखावा ऐसा करता जैसे, सबसे बड़ा वही घर हो।

धन की गरीबी मिट जाती है, कोशिश के पैमानों से,
पर सोच की गरीबी हारती है, केवल अपने अभिमानों से।
जो झुकता है वह पाता है, जो अकड़ा है वह ढहता है,
कुएँ का वासी अंत समय तक, बस कुएँ में ही रहता है।

Adv. आशीष जैन
7055301422

Hindi Poem by Ashish jain : 112017741
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