॥ भगवान बाहुबली स्तुति ॥
दोहा
प्रथम तीर्थंकर आदिप्रभु, ऋषभदेव के लाल।
त्याग मूर्ति बाहुबली, नमो-नमो हर काल॥
अडिग खड़े गोमटेश्वर, पर्वत शिखर विशाल।
शांत सौम्य मुखमुद्रा, आशीष झुकाए भाल॥
स्तुति (लयबद्ध गायन हेतु)
अचल खड़े तुम वन के भीतर, वर्ष बीत गए भारी,
तन पर लिपटी बेलें अद्भुत, महिमा तुम्हारी न्यारी।
पैर जमे हैं पृथ्वी के भीतर, मन है अम्बर पार,
वंदन बारम्बार प्रभुवर, वंदन बारम्बार ॥ १ ॥
काम-क्रोध और मान-मोह को, क्षण में तुमने त्यागा,
चक्रवर्ती का सुख तज करके, संयम पथ पर जागा।
भरत चक्र के द्वंद्व को जीता, फिर भी मन वैराग्य,
धन्य हुआ वह स्वर्ण-कलश, और धन्य हुआ सौभाग्य ॥ २ ॥
सर्प लपेटे देह खड़ी है, पक्षी नीड़ बनाते,
मौन तपस्या देख तुम्हारी, देव सुमन बरसाते।
ना हिलते ना डुलते स्वामी, योग-अग्नि उजियारी,
बाहुबली तुम संकट-भंजन, मंगल-रूप अविकारी ॥ ३ ॥
केवलज्ञान की ज्योति जली जब, मिटा तिमिर का साया,
सिद्ध-शिला पर जा विराजे, छोड़ मोह की माया।
हम भी आए शरण तुम्हारी, दे दो विमल स्वभाव,आशीष मांगे मुक्ति पद, कर दो प्रभु निस्तार ॥ ४ ॥
दोहा
विंध्यगिरि की गोद में, खड्गासन भगवान।
बाहुबली के चरणों में, आशीष करे प्रणाम॥