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महेश रौतेला

महेश रौतेला Matrubharti Verified

@maheshrautela
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मैं हूँ या नहीं
तुम हो या नहीं
कैसे पता लगेगा?
चलो कुछ प्यार कर लें
या कुछ सच बो दें,
उस स्थान पर फिर मिल लें
जहाँ हम मिला करते थे।
कुछ शब्द तुम कहो
कुछ शब्द मैं कहूँ,
इस मौन के बीच
मैं तुम्हें ढूंढूं।
चलो ईश्वर को ले चलें दूर
आज के युद्धों के बीच
नहीं हाँकना है उन्हें रथ।
मैं हूँ या नहीं
ईश्वर तुम हो या नहीं
कैसे पता लगेगा?

*** महेश रौतेला

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मैं हूँ या नहीं
तुम हो या नहीं
कैसे पता लगेगा?----

उजाला ले आये भगवान-
उन शिखरों पर
जो गगन को छूते हैं,
उन घाटियों में
जहाँ नदियां बहती हैं,
उन वृक्षों में
जिनपर फूल खिलते हैं,
उन प्राणों पर
जो करुणा में जीते हैं,
उस रामायण में
जहाँ रावण मारा गया था,
उस महाभारत में
जहाँ गीता बोध हुआ था।

*** महेश रौतेला

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मैं कुछ नहीं कहूँगा तुमसे
प्यार के बारे में
क्योंकि वह शब्दों में नहीं,
आत्मा में है,
कर्म में दुबका पड़ा है।
मैं नहीं कहूँगा तुमसे
साथ चलने को
सूक्ष्म-अँधेरी रात में।
नहीं कहूँगा
छाँव बैठने को
एकान्त में आने को
क्योंकि हमें साथ-साथ उत्पन्न होना है।
नहीं कहूँगा तुम्हें
सच बोलने को,
क्योंकि यह तुम्हारा पुण्य है।
आओ, गुनगुना लें
जीवन के चमत्कार को,
एकात्म होकर।
****

*** महेश रौतेला

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प्यार करते-करते
डूबने लगा था,
पगडण्डियां जिधर थीं
उधर हैं,
उजाला जिधर था
उधर है।
प्यार करते-करते
ठिठक गया था,
राधा-कृष्ण के प्यार सा
बिखर गया था।
चला बहुत था
दुनिया के महाभारत में
खड़ा था,
जो मौन थे
वे भी मर रहे थे।
प्यार के बाद
दुख बहुत थे।

*** महेश रौतेला

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राह खत्म होनी थी
हो गयी,
साथ छूटना था
छूट गया।
मन विचलित होना था
हो गया,
एक जीत के बाद
एक हार होनी थी
हो गयी।
एक पुण्य के बाद
एक पाप होना था
हो गया,
आस्था को टूटना था
टूट गयी।
धरती को धसना था
धस गयी,
फूल को खिलना था
खिल गया।

****
* महेश रौतेला

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दे दे स्वर वीणावादिनी दे दे
भारत की भाषा, भारत में कर दे,
जन-जन के मन में भर दे
स्वच्छ-स्वस्थ राष्ट्र को कर दे।
सहस्र युगों को हमें दिखा दे
वीणा के स्वर सर्वत्र बहा दे,
पग-पग पवित्र पुष्प बिछा दे
जिह्वा से मधु रस बरसा दे।
संग प्यार का प्यारा दे दे
उच्च शिखर की खुशियां दे दे,
स्वच्छ-स्वतंत्र गरिमा दे दे
भारत की भाषा, भारत में रख दे।
रुग्ण मन को शौर्य सुना दे
शुष्क सुरों में प्राण जगा दे,
भारत से प्रिय बातें कर दे
भारत की बातें, भारत में भर दे।
****


*** महेश रौतेला

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अब मैं दुख को दुख नहीं कहता
यह एक शाश्वत सुर है
जो सुख का पड़ोसी है।
कभी पहाड़ में रहता
खिसक कर घाटी में आता,
मैदानों पर चल
मनुष्य के साथ बैठ जाता,
भेष बदल
स्वर को मधुर बना देता।
अब मैं दुख को दुख नहीं कहता
प्यार कहता हूँ,
जिसे मैंने मनभर लिया
मनभर दिया।


*** महेश रौतेला

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सारा अँधेरा यहीं रूका था
जीवन हारा, जन-धन त्यागा,
घिरे उजाले से देखा तो
सारा अँधेरा यहीं जमा था।
युग चलते हैं आदि-अन्त तक
जीवन सारे मुड़ जाते हैं,
संकट आते-जाते हैं
जीवन पहरेदार रहे हैं।


*** महेश रौतेला

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क्षणभर बह जाऊँ ओ नदी
पलभर उछल जाऊँ ओ जलधि,
कुछ देर चढ़ जाऊँ ओ पहाड़
मनभर ठहरा रहूँ ओ पृथ्वी।

कुछ पल देखता रहूँ ओ नक्षत्र
आवागमन चलता रहे ओ प्राण,
सुखमय मौन धरूँ ओ जीवन
बातों में रिटता रहूँ ओ मनुष्य।

छाँव बैठता रहूँ ओ वृक्ष
प्रार्थना करता रहूँ ओ शान्ति,
सत्य पर टिका करूँ ओ चेतना
सुरसुर चलता रहूँ ओ हवा।

* महेश रौतेला

२६.०८.२०२३

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