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बहुत समय से टिकी है पवन पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं वृक्ष पृथ्वी पर, बहुत समय से टिकी हैं नदियां पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं पहाड़ पृथ्वी पर, बहुत समय से टिका है समुद्र पृथ्वी पर, महाभारत से पहले और महाभारत के बाद बहुत समय से टिका है मनुष्य पृथ्वी पर। *** महेश रौतेला
दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है, दुनिया अपनी जगह घूमती घाम की आदत बनी हुई है। प्यार से अच्छा क्या होगा प्यार से सच्चा क्या होगा! श्रीकृष्ण अच्छे हैं राधा भी अच्छी हैं। उनका सुख दुख समान करना मुझे नहीं आता है, जय-पराजय ,लाभ-हानि समान मानना कठिन कठोर है। दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है। *** महैश रौतेला
तुम हमें प्यार का अंदाज दे दो या किसी तीर्थ का सहारा दे दो, या वृक्ष की पूर्ण छाया दे दो या पुष्प की जीवित महक दे दो। शून्य सा ये भरा आकाश दे दो एक मुस्कराती शीतल छवि दे दो, प्रीति के रूके स्रोत खोल दो समय का सशक्त आधार दे दो। नम आँखों का पूर्ण प्यार दे दो स्पर्श का नूतन आभास दे दो, जिन्दगी का मधुर संगीत दे दो तुम मुझे प्यार का हाथ दे दो। *** महेश रौतेला
मरने के बाद तीता(कड़ुआ) भी मीठा लगने लगता है, चुप्पी में प्यार आने लगता है मन मुटाव हँसाने लगता है, अधैर्य, धैर्य बन जाता है। मरने के बाद तीर्थ एकान्त लगता है काँटे फूल से दिखते हैं, अँधेरे में दिखने लगता है सूनापन आजाद हो जाता है। *** महेश रौतेला
बन्द करो ये चलना-फिरना बन्द करो ये जय-जयकार, दीर्घ शान्ति को आ जाने दो बन्द करो ये भाषणवाद। आ जाने दो हवा शान्ति की रह जाने दो अरण्य देवतुल्य, बन्द करो ये ठगना-ठगाना बन्द करो ये शैक्षिक व्यापार। पूर्ण करो पूजा मन की बन्द करो लय के व्यवधान, आ जाने दो स्नेह की धारा बन्द करो झूठे वादे सादे। रोको सारे रण के रथ बन्द करो ये जय-जयकार, सुख-दुख रख प्राणों के अन्दर ले आओ सब फूल भरे रथ। **** महेश रौतेला
उसने एक फूल चुना और मेरे भाग्य पर चढ़ा दिया, उसने एक पत्थर उठाया और मेरे भाग्य पर दे मारा, फिर उसने एक फूल चुना और अन्तिम संस्कार पर चढ़ा दिया। *** महेश रौतेला
जहाँ तुम बैठती थी वहीं पर बैठा हूँ, भोर सपने में कह रही थी "मैं आ गयी हूँ" मैंने कहा सचमुच आ गयी हो तुमने कहाँ "हाँ"। फिर बोली," मुझे छूना मत" शायद इसलिए कि तुम स्वर्ग हो आयी थी, और मैं नश्वर जगत में बिस्तर पर सोया था। *** महैश रौतेला
आधा-चौथाई जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य, खिलता-मुरझाता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य। चढ़ता-उतरता जितना हूँ हूँ तो मनुष्य, जाता-लौटता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य, दौड़ता-हाँफता जितना हूँ हूँ तो मनुष्य, जीता-मरता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य। *** महेश रौतेला
तन भी संगम मन भी संगम, जहाँ स्नान किया वह भी संगम। धरा पर जीवन संगम शिखरों पर उन्नत संगम, जल का बहता संगम आकाश में अद्भुत संगम। पग-पग पर पूजा का संगम स्वर-लय का समधुर संगम, जीवन-मृत्यु का अटूट संगम यहाँ मुस्कानों पर शाश्वत संगम। ** महेश रौतेला
ध्रुव ने तपस्या की और ध्रुव पद पाया, सिद्धार्थ ने तप किया ज्ञान पा मोक्ष पा लिया, हम आजीविका कमाते-कमाते तप गये, प्यार को पकड़ न सके समता पर झगड़ न सके, शुद्ध समयवादी होकर समय पर लटक लिये। *** महेश रौतेला
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