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पत्र तुमने पढ़ा नहीं लिखा था," गगन में असंख्य नक्षत्र हैं असंख्य तारों में दूरी बड़ी है, धरती पर गाँव बसे हैं इधर-उधर शहर जुड़े हैं, प्यार के लिए अथाह जगह है। जंगल में डर छुपा है नदी में भँवर विचित्र है, घरों के नाम बड़े हैं पर मनुष्य का आवास न्यून है। रखने को प्यार बहुत था ममता का उधार बड़ा था, पत्र जो पढ़ा नहीं एक शब्द उसमें अदृश्य,गहन था। बातें अक्षुण्ण थीं सारांश संक्षिप्त था, लोक-परलोक का विवरण लिखा था मन ने मन को पढ़ा जहाँ था। कथा कहने का मन हुआ तुमने जिसे अनसुना किया, घर से निकलना कठिन था राह का मिलना जटिल था। जीजिविषा जागी हुई थी समय में संघर्ष छुपा था, पत्र जो मैंने लिखा था प्यार में प्रकट हुआ था। *** *** महेश रौतेला
कहाँ विराम लगेगा पता नहीं, सत्तर, अस्सी,नब्बे या उससे पहले। कहाँ से बुलावा आयेगा पता नहीं, धरती पर छीना झपटी चलते- चलते शान्ति पर विश्वास बढ़ेगा। कहाँ शाम होगी कौन छूटेगा, किसकी विदाई में आँखें नम हो जायेंगी, वक्त बतायेगा। **** *** महेश रौतेला
हम इच्छाओं को ढूंढते रहते हैं वसंत के खुलासे में, गंगा के जल में हिमालय के हर शिखर पर। प्यार हमारे लिए जीवित होता बहुत छोटी पगडण्डियों में, घास के मैदानों में घर के स्वभाव में। इच्छाओं का हाथ बहुत लम्बा होता है, वसुंधरा से आगे स्वर्ग तक फैला होता है। इस साल से, उस साल में जाते चीते का वेग पकड़े, शिकार भी हैं, शिकारी भी हैं शुभकामनाओं के आगार भी हैं। ***** साल 2026 की शुभकामनाएं। ** महेश रौतेला
मरना बुरी बात नहीं शोक की बात है, मनुष्य जो मर गया उसमें भगवान था। पेड़ जो सूख गया उसमें कभी प्राण था, संग-संग जिया गया वह पावन परिवार था। टूट के संग भी निकट का जुड़ाव था, रोग जो हुआ था उसका भी निदान था। अस्तव्यस्त राह में मिलन सुकुमार था, गीत के पास में स्वरों का संसार था। मरना एक विराम है प्रकृति में अनिवार्य है, जो सांस में आया-गया उसके निकट भगवान है। *** ** महेश रौतेला
अगाध ममता में विराम लगना था लग गया। घूमती-फिरती ममता को थमना था, थम गयी। स्नेह का विभाजन होना था, हो गया। तुम नहीं हो मैं हूँ, रिक्तता को प्रकट होना था,हुयी। *** महैश रौतेला
पहले तुम मेरे पते पर रहते थे अब नहीं हो, लोग कहते हैं अब भगवान के पते पर रहते हो, और मैं तब से चुपचाप सोच रहा हूँ- कि उनसे क्या पूछना! *** महेश रौतेला
तुम्हारी काया कब मुझमें समा गयी पता ही नहीं चला, कब सांसों में आना-जाना हुआ पता ही नहीं चला। कब गरम हवा ठंडी हुयी राह घूम गयी, कब दिन-साल सिमट गये पता ही नहीं चला। *** महेश रौतेला
नैनीताल( विद्यालय के दिन): वहाँ मेरा होना और तुम्हारा होना एक सत्य था, इस बार वहाँ जाऊँगा तो सोहन की दुकान पर चाय पीऊँगा, रिक्शा सटैंड पर बैठ कुछ गुनगुना लूँगा, बिष्ट जी जहाँ खड़े होते थे वहाँ से दूर तक देखूँगा, यादों की बारात में तुम्हें खोजते-खोजते नीचे उतर आऊँगा। नन्दा देवी के मन्दिर में जा सभी देवी देवताओं को धन्यवाद दे कहूँगा कि जैसा चाहा वैसा नहीं दिया पर जो दिया वह भी मूल्यवान है जन्मों का फल है, नैनी झील को नाव से पार करते समय देख लूँगा वृक्षों के बीच दुबके छात्रावासों को, धूप सेंकने बैठे खिलखिलाते-शरमाते चेहरों की ओर जो लगता है हमारे जमाने से बैठे हैं। हवा जो बह रही है उससे पूछ लूँगा तुम कब तक रूकोगी यहाँ, वृक्ष जो छायादार हैं उनसे पूछ लूँगा कब तक फलोगे यहाँ पर, जब उत्तर मिलेंगे तब तल्लीताल आ जाऊँगा। डाकघर पर अपनी पत्र की प्रतीक्षा में खो जाऊँगा दीर्घ सांस लेकर। इधर मिलना उधर मिलना पैरों से कहूँगा रुक जाओ नहीं होगा पार मन, शाम घिर आयी है। ठंडी सड़क को पड़ी रहने दें एकान्त में, पाषाण देवी के मन्दिर जा, सोचें चलो लौट चलें गाँव के पास। देवदार के पेड़ अपनी छाया में मिला लेंगे हमारी छाया, हम समय के द्वार खोल अन्दर हो आयेंगे, बत्तखों को देखते चलते-फिरते,आते-जाते स्वयं को भूल जायेंगे। अपने को भूलने के लिए बुद्ध होना होगा, अपने को भूलते हुये किसी से भी मिल लेंगे, आटे की दुकान से आटा खरीद लेंगे चावल की दुकान से चावल तेल की दुकान से तेल और पका लेंगे अपना खाना। कभी-कभी प्यार का सुर सुन हो जायेंगे उदास। समय का कोई ठिकाना नहीं विद्यालय की कक्षा में बैठ ज्ञान-विज्ञान के आश्चर्य जान लेंगे, मन नहीं मानेगा तो आकाश और धरती को देख खुश हो लेंगे, बर्फ के गोलों की ठंड स्वयं ही नहीं दोस्तों को भी छुआयेंगे, अपने को ही नहीं दूसरे को भी देखेंगे, फूल सी हँसी कभी कहीं से झड़ बना सकती है लम्बा मार्ग, मनुष्य के लिए सब कुछ सरल नहीं कभी वह आग में जल सकता है कभी बाढ़ में बह सकता है, हर चाह चकित करती है मरने के बाद फिर जीवित होती है। हस्तलिखित हमारा मन मालरोड के पुस्तकालय में पढ़ सारे समाचारों को इकट्ठा कर एक-दूसरे को बतायेगा, तब हमारी दुनिया वहीं इकट्ठी हो जायेगी। इसी बीच कहने लगूँगा "ठंड में मूँगफली, सिर्फ मूँगफली नहीं होती, प्यार की ऊष्मा लिए पहाड़ की ऊँचाई को पकड़े होती है। हाथों के उत्तर चलते कदमों की साथी, क्षणों को गुदगुदाती बातों को आगे ले जाती, सशक्त पुल बनाती उनको और हमको पहचानती, तब मूँगफली, सिर्फ मूँगफली नहीं होती. (वही मूँगफली जो साथ-साथ मिलकर खाये थे।)" *** महेश रौतेला
प्यार के लिए रोये हो क्या तुम! हाँ, गाय भी रोई है भैंस भी रोई है, हाथी भी रोया है शेरनी भी रोयी है, बकरी भी रोयी है प्यार के लिए सब रोये हैं। *** महेश रौतेला
समय अभी तो महल रचेगा महल बनाकर ध्वस्त करेगा, जीवन में आग लगाकर उसे हवा दे तीक्ष्ण करेगा। सब नदियों में बहा करेगा तीर्थ बनाकर पवित्र बनेगा, विशाल समुद्र में थमा रहेगा सबके हाथों बँटा करेगा। टूट- फूट में रमा करेगा जीवन से बहा करेगा, सूखी लकड़ी वह जलाकर स्वयं सदा गरम रहेगा। किसी युद्ध से नहीं डरेगा भू-जीवन पर चला करेगा, महल बनाकर राज करेगा ध्वस्त हुआ तो नया रचेगा। *** महेश रौतेला
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