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Prakash

Prakash

@pk4ever4u


मैं बहुत दूर हूँ तेरी निगहबानी से
मुझे निकाल न अपनी कहानी से

तेरे लब हैं ज़रूरी अब लगता है
मेरी प्यास न बुझेगी अब पानी से

मेरी क़दर कैसे करतीं तुम भला
मैं तुमको मिल गया था आसानी से

तुम बिन किस तरह हो गया बर्बाद मैं
लोग देखते हैं मुझको हैरानी से

वो फूल, पर्स, डायरी संभाल रखी है
मुझे प्यार है तेरी हर निशानी से

✍️प्रकाश कुमार

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न किसी चेहरे पे अब नज़र जाए,
ज़िंदगी जैसे-तैसे गुज़र जाए।

उसके साथ कहाँ फिर सुकून मिले,
जब कोई दिल से ही उतर जाए।

जो मेरी ग़ज़ल पढ़ ले एक दफ़ा,
आँख मुमकिन है उसकी भर जाए।

हसीन वादियों का भला क्या करे,
जब कोई जीते-जी ही मर जाए।

साँसें थमने लगी हैं तुम्हारे बिन,
तुझ तक कैसे भी ये ख़बर जाए।

मेरी दुनिया उजाड़ने वाली, सुन,
तेरी दुनिया चाहता हूँ सँवर जाए।

✍️ प्रकाश कुमार

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वो मेरी कश्ती, मेरा किनारा था कभी,
वो मेरा सारे का सारा था कभी।

लोग करते हैं न यक़ीन इस बात पर,
कि वो शख़्स हमारा था कभी।

उससे बिछड़कर न होश आया मुझे,
वो मेरा आख़िरी सहारा था कभी।

कैसे कहूँ उसके रेशमी बालों को,
अपने हाथों से मैंने सँवारा था कभी।

मैंने भी इश्क़ की राहों पर,
अपना सब कुछ हारा था कभी।

उसे देख कर ऐसा लगता था,
रब से चांद ज़मीं पर उतारा था कभी।

वक़्त ने छीन लिया मुझसे उसे,
जो मुझे जान से भी प्यार था कभी।

✍️प्रकाश कुमार

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