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गुनाहों का पुतला गुनाह मेरा बस इतना था कि मैंने ख़्वाब देखे। ख़्वाब, जो वास्तविकता के उलट थे। ख़्वाब, जो परंपरा के उलट थे। ख़्वाब, जिन्होंने मुझे मेरे दोस्तों से अलग कर दिया। नतीजा यह हुआ— दोस्त सारे आगे निकल गए, अब उनके नए दोस्त बन चुके हैं, उनके जैसे। वो अब कमाने लगे हैं पैसे और खुशियां, कमाने लगे हैं सम्मान और शोहरत। अब वे खरीद सकते हैं सुख और सुविधाएं, खरीद सकते हैं प्यार और दवाइयां। इन सबके बीच मैं… कहीं बहुत पीछे छूट गया, पहचान से भी, और अभिमान से भी। मैं अब ख़्वाबों के भी ख़्वाब देखने लगा हूं। पहले जो थोड़ा-सा नाखुश हुआ करता था, अब वही मिल जाने पर भी नाज़ करने लगा हूं। मैं उलझ गया हूं अपने ही भीतर। तरसता हूं दो खुशी के पलों के लिए, मैं तो अब जागता हूं सपनों में। आर्थिक स्थिति मेरी खराब है, मानसिक स्थिति भी कमजोर है, और खराब होने लगे हैं रिश्ते। घुट-घुट कर ज़िंदा हूं, अब मौत भी मेरे नसीब में नहीं है। मैं अपने गुनाह का प्रायश्चित किस्तों में चुका रहा हूं। सब कुछ हार चुका हूं, लेकिन अभी भी उम्मीद नहीं हारी है। उम्मीद इस बात की— एक दिन ये सारे ज़ख्म, ये सारे दुःख ख़्वाबों से भर दूंगा।
कोई सुनने वाला तो हों अब बहुत हो गया… सब्र जवाब दे रहा है, अब तो दिल भी बेचैन हो उठा है। कोशिश हमने बहुत की है, ख़ामोश रहने की। एक ही तो दोस्त था, दिनों से उससे भी बात नहीं की। अपनों से कोई गिला-शिकवा तो नहीं हमारा, फिर भी राब्ता नहीं हुआ उनसे, न कोई याद रही। जीना चाहता था अपनी ज़िंदगी, ख़ुद पर काम करते-करते। रातें भी बस बेबस, काम करते-करते काटी हैं। दिन तो शुरू ही काम से होता था। सोचा था, इस तरह दुनिया से छुपकर, देखे थे जो सपने अपने लिए, उन्हें एक बेहतर मुकाम दे सकूंगा। क्या पता था, इस तरह बंधन टूट जाएंगे। इस जुदाई में, हम कब ग़म से जुदा हुए? पहले तो अपनों से, फिर जानने वालों से भी जुदा हुए। दूरियां यहां ख़त्म नहीं हुईं, अब तो मुश्किल से कभी किसी से, किसी मौज़ू पर दो बातें ही होती हैं। वो भी काम और कारण की मर्यादा से बंधी होती हैं। और वो सोचते हैं, कि हम मतलबी हो गए? घर का ज़िम्मा भी तो कंधों पर लिए हूं, जो मुझे भीतर से कठोर और गंभीर बना देता है। अंदर के बच्चे को, इंसान बना देता है, जो दूसरों की तरह जिंदादिल होना चाहता है। घूमना चाहता है, कॉलेज में दोस्तों के साथ जाकर पढ़ना चाहता है। दो बातें दुनिया की करके, ज़ोर-ज़ोर से हंसना चाहता हूं। मौजूदा लम्हों की नज़ाकत का लुत्फ़ उठाना चाहता हूं। लेकिन ये ज़िंदगी मुख़्तलिफ़ है मेरी… जो सकड़ी गाड़ी के घोड़े की तरह है, मिल में काम करने वाले उस मामूली मज़दूर की तरह है। ठीक वैसी ही ज़िंदगी मेरी भी है। दिल तो करता है, उनसे वो सब साझा करूं, विस्तार से कहूं… लेकिन कोई सुनने वाला तो हो, जो सच में मेरी बात सुनने की रुचि रखता हो। उनका सिर हिलाना ही मेरे लिए काफ़ी है, लेकिन दिल से। ख़ुद से ऊब गया हूं बतियाकर, थक गया हूं ख़ुद के सवालों का जवाब ख़ुद ही देकर। डर है इस बात का, कहीं बातें करना न भूल जाऊं। जहां जवाब मेरा नहीं होगा, तुक का मेल हो या न हो… क्या मैं यही ज़िंदगी जीना चाहता था? अगर हां… तो ये बेचैनी क्यों उठ रही है? ये आग क्यों मुझे जला रही है? बस अब सवाल ही सवाल हैं, जिनकी सीमा भी सवालों से घिरी नज़र आ रही है। जिनका जवाब शायद मुझे आने वाले सफ़र में मिलेगा, और शायद नहीं भी…!
जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ यहाँ लड़ते हैं, कुछ समझौते करते हैं। कुछ खुद के लिए लड़ते हैं, कुछ दूसरों के लिए मरते हैं। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ भाग जाते हैं युद्ध मैदान छोड़कर, कुछ मृत्यु से भी भिड़ जाते हैं घुटने टेककर। कुछ लड़ते हैं तीर-तलवारों से, कुछ लड़ते हैं अपने विचारों से। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ यहाँ रणनीति बनाते हैं युद्ध की। कुछ को जीत से फर्क नहीं पड़ता, नहीं फर्क पड़ता कौन जीतेगा या हारेगा। केवल लड़ते हैं, क्योंकि वे लड़ना जानते हैं। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ यहाँ जीतते हैं, कुछ हारते हैं, कुछ जीतकर हारते हैं, कुछ हारकर जीतते हैं। हार-जीत के मायने क्या हैं? कुछ सीखते हैं, कुछ सीखते दिखते हैं। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ गरजते हैं आंधी बनकर, कुछ बहते हैं दरिया की तरह। कुछ घातक सन्नाटे की तरह, कुछ बरसते हैं आंसू बनकर। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! कुछ यहाँ कृष्ण हैं, कुछ अर्जुन। कुछ सारथी बनकर राह बताते, कुछ स्वार्थी होकर राह बनाते, कुछ रह जाते हैं वीरान बनकर। जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है! जीवन एक युद्ध मैदान ही तो है!
"कभी अपने हुनर का घमंड मत करना, मैंने इस दुनिया के बेहतरीन तैराकों को पोखरों में डूबते देखा है।"
बड़ा आसान होता है दूसरों पर इलज़ाम डाल देना, उससे भी आसान होता है ख़ुद को निर्दोष साबित कर देना। मुश्किल होता है दूसरों को समझना, उससे अधिक मुश्किल होता है ख़ुद की गलती स्वीकार कर लेना।
धर्म से किसी का पेट नहीं भरता है, मगर बिना धर्म के हर कोई भूखा है।
“ First impression is the last impression, and the last impression is the most important.” ~AuthorRtjd कुछ रिश्तों की शुरुआत आहिस्ते-आहिस्ते होती है, दीवारों पर लगी काई की तरह। कुछ बंधन जल्दी मुरझा जाते हैं, फूल की कली की तरह। तो कुछ वक्त के साथ मज़बूत होते चले जाते हैं, बरगद के पेड़ की तरह। मगर, सबसे अहम होता है वो आख़िरी लम्हा वो आख़िरी मुलाकात या लफ़्ज़, जो सारी अच्छी-बुरी यादों पर किसी गहरे रंग की तरह चढ़ जाता है। कुछ दाग़ बनकर, कुछ दरिया के बहते पानी की तरह।
गुड़हल का वह फूल आज़ाद है, कुछ कुदरत के बंधनों से, सालभर हंसता-खिलता है, बदले में थोड़ी-सी देखभाल और प्यार चाहिए इसे, फिर खूबसूरती हर तरफ, जवानी इसकी आबाद है। आज जहां ये खिला है, वह एक जेलखाना है, लेकिन इसे कोई एतराज़ नहीं, चाहे पानी कोई साधु दे या कैदी पानी तो पानी रहेगा, और यह फूल खुश है यहां, क्योंकि काम इसका मुस्कुराना है। फूल हमेशा मुस्कुराता रहता था, ना मुस्कुराने की कोई वजह भी नहीं थी, वो कैदी भी रोज़ आता था, पानी डालकर उस फूल में, कुछ देर बैठकर उसके साथ ना जाने क्या फुसफुसाता रहता था। जैसे दो घनिष्ठ मित्र आपस में बातें कर रहे हों, शायद दोनों आदी हो चुके थे एक-दूसरे के। कभी बातें होतीं, कभी न भी होतीं, लेकिन वो रोज़ाना मिल रहे थे। गुड़हल का वह फूल अब राज़दार था, कैदी की उन सब बातों का, जो कभी वो नहीं कहता किसी और के सामने। अब वो भी समझने लगा था, कि वो आज़ाद नहीं है वो एक गुनाहगार था। आज कैदी उस बाग में उदास बैठा है, वह शांत है और हताश भी, क्योंकि आज उसका घनिष्ठ मित्र उस बाग में नहीं था। था तो बस उसका खाली डंठल बिलकुल खाली। कैदी इसलिए निराश बैठा है। गुड़हल का वह फूल जलीक ने तोड़ लिया था। शायद वो बेखबर था, और जालिम भी। उसे एहसास भी था? उसने किसी का सहारा छीन लिया था। जलीक तो बेहद खुश था, उसने एक लंबे अरसे से इस फूल पर अपनी नज़र बनाकर रखी हुई थी। बाग में वह फूल लगाने का सुझाव भी जलीक का ही था। आज वो सफल हो गया, क्योंकि आज उसने फूल तोड़ लिया था। जलीक को फूल की सुगंध और रंग भा गया था। उसने बड़े प्यार से फूल को एक थैली में संभाल कर रख लिया। जलीक जानता था आखिरकार इस फूल को अपने असली घर पहुंचने का सही वक्त आ गया है। जलीक की अर्धांगिनी एक धार्मिक स्त्री थी, उसने गुड़हल का वह फूल देखकर जलीक की बेहद प्रशंसा की। आज उसके पूजा का दिन था, उसने ईश्वर के हाथ जोड़कर शुक्रिया अदा किया। वो मान बैठी कि ये उसकी भक्ति का फूल है। वह तुरंत ही ईश्वर की आराधना में लग गई, उसने वो फूल पूजा थाली में सबसे आगे रखा, और सच्चे मन से पूजा में लीन हो गई। वो प्रसन्नता के मारे, आज हर बार से अधिक देर तक पूजा करती रही। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि कहानी का आगाज़ अब हुआ है। यहां अब बहुत सारी कहानियां जन्म लेंगी केवल एक ही सवाल के साथ... “फूल किसका है?”
बड़े शहर के छोटे लोग ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, उससे भी ऊँचा लालच है। चारों दिशाओं में पक्की सड़के हैं, रोशनी में तर-बतर, और टूटी-फूटी सबकी मानस है। बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं, उससे भी बड़ा आलस है। किस काम की वो शोहरतें, किस काम की वह तरक्की, जहाँ पैदल चलना भी आफ़त है। चमकती ये रंगीन बस्तियाँ, विज्ञान और विकास की बदौलत, ये उच्च कोटि की आबादियाँ। आविष्कार और विलासिता की मूरत हैं, इंसानियत और कुदरत के मुख़ालिफ़त। कैसे बड़े लोग हैं? हर चीज़ को स्वार्थ के तराजू से नापते है।
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