गठरी में सिमटा अथाह अपनत्व
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मायके से लौटती बेटी, अपने हाथों में,
एक छोटी सी गठरी लेकर आती है।
पर उस गठरी की कीमत उससे पूछो,
वो महज छोटी- छोटी चीजें नहीं,
वह तो भावनाओं का अथाह समंदर है।
खट्टे - मीठे आचारों की महक,
जो हर कौर के साथ,
बचपन की गलियों में लौटा ले जाए।
छोटी - छोटी निमकियों में गुंथी होती है,
माँ की अनगिनत दुआऐं,
थक जाये जब जीवन पथ तब राह दिखाये।
शकरपारे में घुली वो मिठास ,
जैसे चुपके से समझा रही हो,
रिश्तों में घोलना हर पल मिठास।
और उन नन्ही पन्नी में बंधी चटनिया,
शायद यही समझाती है,
रिश्ते चाहे कितने ही स्वतंत्र क्यों ना हो जाए,
उसमे अपनी उपस्थिति चटनी की तरह जरूर रखना।
ना जाने कितने अनमोल सबक समेटे होती है,
वह छोटी- सी गठरी, माँ की सारी अनकही बातों का सार,
बेटी के जीवन के नाम, एक मौन उपहार।
-----आकांक्षा श्रीवास्तव