कभी तो सुनो बिना कहे...
कभी तो समझो...
दिल की ज़ुबान...
कभी तो आंखों के दर्द को पढ़ो...
हर बात कहने की तो नहीं होती...
हर बार चीजों को समझाने का समय तो नहीं होता...
दिल का मौसम हमेशा अच्छा नहीं होता...
कभी तो इस आंगन में गम भी उतरते हैं...
कभी तो अंदर कहीं बारिश होती है...
जो आंखों से चाहे बह न पाए...
वो ज़ुबान पर कभी आ न पाए...
वो जज़्बात, वो तकलीफ...
वो अनकही, वादों के टूट जाने का दुख...
वो अकेले रह जाने का डर...
वो ज़िंदा होकर भी...
ज़िंदगी के एहसास न होने का डर...
क्या कभी महसूस कर सकते हो?
जो था मेरे पास... वो भी खो दिया...
वो नुकसान पूरा कर सकते हो?