आज की नारी
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तुझे निर्भर नहीं स्वयं आत्मनिर्भर बनना है।
यही निर्भरता तेरी गुलामी की निशानी है, जिसे अब ढहना है।
तुझे दूसरों के बल से नहीं अपने आत्मबल से चलना है।
तुझे झुकना नहीं, तुझे लड़ना है, बनकर अडिग अचल।
हर उस परिस्थिति से लड़ जहाँ तुझे समझौता करना पड़े,
तु उठ खड़ी हो ऐसे की सामने मुश्किल भी ना अड़े।
दूसरों की वजह से नहीं खुद की वजह से स्वाभिमानी बन।
पिंजरे की कैद नहीं, तु स्वछंद गगन का जीव बन।
तुझमे है लक्ष्मी - सा वैभव और दुर्गा - सी शक्ति।
तुझमे है भक्ति मीरा- सी और हो तुम राधा सी त्याग की परछाई।
फिर क्यों तुझे झुकना है और क्यों तुझे अब दबना है?
खुले गगन की उड़ान है तू,
तुझे क्यों पिंजरे में थमना है,
सिद्ध कर दे आज की हम औरतें, दर्द देना नहीं जानती।
पर सहना भी अब स्वाभिमान के विरुद्ध है ये दुनिया मानती।
अब ना कोई समझौता होगा, ना कोई लाचारी होगी।
तेरी अपनी शक्ति ही अब तेरी सबसे बड़ी सवारी होगी।