फूटपाथ पर बिकती जिदंगी
--------------------------
फूटपाथ में ना सिर्फ सामानें बिकती है,
बल्कि यहाँ पर बिकती है, किसी की उम्मीदें,
किसी के सपनें, किसी बेबस, लाचार पिता के अधूरे ख्वाइशें को पूरा कर पाने की चाहतें।
ये उन चेहरे पर खुशियाँ सजाते है, जिनके कदम शायद उन महंगे शोरूमों को कभी पार कर पाते।
यहाँ ना सिर्फ हर रोज दुकानें सजती है,
हर एक दुकान के साथ सजते हैं कितने सारे ख्वाब
वो ख्वाब जिन्हें हकीकत की जमीन मिलना शायद मुकद्दर में ही नहीं।
वो जो कांच के ऊँचे ऊँचे दीवारों के पीछे जो ब्रांडेड कपड़ों के पीछे जो मुस्कुराते हुए टैग है,
उन्हें निहारती वो बेबस, पथरायी आँखों में चमक दे जाती है वो फूटपाथ पर करीने से सजी दुकानें।
जेब में खनकते सिक्के और वो चंद नोटें से भी पूरी हो जाती है वो सारी हसरतें, वो सारे अधूरे ख़्वाब।
सड़क पर बिकती वो सारी चीजें ना सिर्फ सामानें है,
बल्कि इनसे जुड़ी है किसी का सकून किसी का सम्मान।
ये सिर्फ बाजार की रौनक नहीं, उम्मीदों के चमकते सितारे है।
ये दुकानें ही तो उन लाचारों के फरिश्तें प्यारे है।