“जयपुर की बारिश में खोई यादें”जयपुर ट्रिप के दौरान अचानक अपने एक्स-हस्बैंड से मिलने के बाद, मैं कमज़ोर हो गई और उनके साथ एक मज़ेदार रात बिताई…
जयपुर की वह रात असामान्य रूप से शांत थी, लेकिन आसमान जैसे अपने भीतर दबे हुए किसी दर्द को बरसात की मोटी बूंदों में बाहर निकाल रहा था। मानसून की बारिश होटल की ऊँची खिड़कियों से टकराकर ऐसी आवाज़ कर रही थी मानो किसी पुराने गीत की उदास धुन बज रही हो।
मैं होटल के बार के कोने में अकेली बैठी थी।
मेरे सामने आधी पिघली हुई मार्गरीटा का गिलास था। उसके किनारों पर जमी नमक की परत धीरे-धीरे नमी से घुल रही थी। सॉफ्ट जैज़ म्यूज़िक हल्के-हल्के बज रहा था, और उसके साथ मिलकर बारिश की बूंदें एक अजीब सा सुकून और उदासी पैदा कर रही थीं।
मेरा नाम अनिका है।
चौंतीस साल की, एक सफल महिला, अपनी मेहनत से बनाई हुई जिंदगी के साथ। लोग कहते हैं मैं मजबूत हूं, आत्मनिर्भर हूं। लेकिन सच यह है कि कुछ जख्म ऐसे होते हैं जो बाहर से नहीं दिखते।
तीन साल पहले मेरा तलाक हुआ था।
कागज़ पर वह बस एक कानूनी प्रक्रिया थी। लेकिन दिल के अंदर… वह किसी तूफान से कम नहीं था। तीन साल बीत चुके थे, फिर भी कुछ यादें ऐसी थीं जो पूरी तरह खत्म नहीं हुई थीं।
मैं जयपुर काम के सिलसिले में आई थी — कम से कम यही आधिकारिक वजह थी।
असल में, शायद मैं अपने खाली अपार्टमेंट से भागना चाहती थी। उन दीवारों से, जो अभी भी अतीत की गूंजों से भरी हुई थीं।
घड़ी ने रात के ग्यारह बजाए।
मैंने गिलास को हल्के से घुमाया और खिड़की के बाहर गिरती बारिश को देखने लगी।
तभी अचानक मेरे पीछे से एक आवाज़ आई।
“अनिका? क्या वह तुम हो?”
मेरे हाथ वहीं रुक गए।
वह आवाज़…
मेरी रीढ़ में जैसे ठंडी लहर दौड़ गई।
यह आवाज़ इतनी परिचित थी कि एक पल के लिए मुझे लगा मैं सपना देख रही हूँ। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैं तुरंत मुड़ी नहीं।
क्योंकि अगर मैं मुड़ती… और वह वही होता… तो?
धीरे-धीरे मैंने अपनी कुर्सी घुमाई।
और अगले ही पल मेरी सांसें रुक गईं।
मेरे सामने खड़ा था—
अर्जुन।
मेरा पूर्व पति।
तीन साल पहले अदालत के उस ठंडे कमरे में जिस आदमी ने मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए निकल जाने का फैसला सुनाया था… वही आदमी आज मेरे सामने खड़ा था।
वह पहले से भी ज्यादा परिपक्व और आकर्षक लग रहा था। नेवी ब्लू सूट, हाथ में रेड वाइन का गिलास, और चेहरे पर वही आधी मुस्कान… जो कभी मेरे दिल की धड़कन बढ़ा देती थी।
“अर्जुन…?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकल पाया।
वह मुस्कुराया और मेरे पास वाली कुर्सी खींचकर बैठ गया।
“कितना अजीब संयोग है,” उसने कहा। “तीन साल बाद… और तुम यहाँ।”
उसकी खुशबू हवा में घुल रही थी — वही चंदन की हल्की खुशबू जिसे मैं कभी पहचान सकती थी, चाहे भीड़ कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
पहले कुछ मिनट अजीब चुप्पी में बीते।
फिर बातचीत शुरू हुई।
पहले औपचारिक सवाल — काम कैसा चल रहा है, जिंदगी कैसी है, स्वास्थ्य कैसा है। लेकिन जैसे-जैसे शराब के घूंट बढ़ते गए, बातचीत भी गहराई में उतरने लगी।
अर्जुन ने बताया कि वह अब दिल्ली में रहता है। उसका रियल एस्टेट बिज़नेस बहुत तेजी से बढ़ रहा है। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स, विदेश यात्राएं, नए अवसर।
मैं बस सुनती रही।
कभी-कभी उसकी आँखें मेरी आँखों में टिक जातीं, जैसे वह मेरे चेहरे पर कोई पुरानी याद ढूंढ रहा हो।
फिर उसने अचानक पूछा—
“और तुम? तुम्हारी जिंदगी में कोई नया है?”
मैं हँस पड़ी।
“नहीं,” मैंने कहा। “शायद काम ही काफी है।”
अर्जुन ने गहरी सांस ली।
फिर उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया… और मेरे हाथ को हल्के से छू लिया।
उस स्पर्श में कुछ ऐसा था जिसने मेरे अंदर दबी हुई यादों को जगा दिया।
“अनिका…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“मुझे माफ कर दो।”
मैं ठिठक गई।
क्योंकि तीन साल में पहली बार… अर्जुन ने अपनी गलती स्वीकार की थी।
उसकी आँखों में पछतावा था।
या शायद… मुझे ऐसा लगा।
उस रात बारिश बाहर गिरती रही, संगीत बजता रहा… और हमारी बातचीत धीरे-धीरे हमें उस अतीत के करीब ले जाने लगी जिसे हमने कभी पीछे छोड़ दिया था।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह मुलाकात सिर्फ एक संयोग नहीं थी…
बल्कि एक ऐसी रात की शुरुआत थी जो मेरी जिंदगी की सबसे खतरनाक सच्चाई को सामने लाने वाली थी।
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