ऋगुवेद सूक्ति-- (४०) की व्याख्या
न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता --ऋगुवेद
भावार्थ --हे मघवन(ईश्वर) ! आपके सिवा दूसरा सुख देने वाला कोई नहीं है।
“न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता”
पद–व्याख्या
न — नहीं
त्वत् अन्यः — आपसे अन्य, आपके अतिरिक्त
मघवन् — हे दानी प्रभु (इन्द्र के लिए प्रयुक्त संबोधन)
अस्य — इस (जगत / भक्त) का
मर्दिता — कष्ट दूर करने वाला, दुःख का नाश करने वाला
भावार्थ--
हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में दुःखों को दूर करने वाला और सच्चा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
संक्षिप्त व्याख्या--
ऋग्वेद के इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि परमात्मा ही संसार का वास्तविक सहायक और रक्षक है।
वही मनुष्य के दुःखों का नाश करता है।
वही कल्याण और सुख का दाता है।
इसलिए मनुष्य को ईश्वर पर विश्वास, प्रार्थना और श्रद्धा रखनी चाहिए।
इसका संदेश है कि सच्चा आश्रय और सुख केवल परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
वेदों में प्रमाण--
१-ऋग्वेद १०.१२१.२
“यो देवानां नामधा एक एव।”
भावार्थ: वही एक परम सत्ता है जो सब देवताओं का आधार है।
२- यजुर्वेद- ३२.११
“न तस्य प्रतिमा अस्ति।”
भावार्थ: उस परमात्मा के समान या उसके बराबर कोई नहीं है।
३-अथर्ववेद- १०.८.१
“यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति।”
भावार्थ: वही परमात्मा भूत, भविष्य और सम्पूर्ण जगत का अधिष्ठाता है।
सार:
वेदों का सिद्धान्त है कि—
परमात्मा ही एकमात्र सर्वोच्च सत्ता है।
वही सुख देने वाला और दुःखों का नाश करने वाला है।
उपनिषदों में प्रमाण--
१-श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.१७
“यो देवानाṁ प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।”
भावार्थ: वही परमात्मा देवताओं का भी कारण है और सम्पूर्ण जगत का स्वामी है।
२-श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.१८
“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।”
भावार्थ: जो परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उसी परमात्मा की शरण लेनी चाहिए।
३-कठोपनिषद्- २.२.१३
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्।”
भावार्थ: वह एक परमात्मा सब नित्य और चेतन प्राणियों में श्रेष्ठ है और वही सबकी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है।
४- मुण्डकोपनिषद्- २.२.११
“ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्
ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।”
भावार्थ: आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ सब ओर वही ब्रह्म (परमात्मा) है।
५-ईश उपनिषद-- ८
“स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।”
भावार्थ: वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध और निष्पाप है; वही सबका परम आधार है।
६-मैत्री उपनिषद्- ६.१७
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।”
भावार्थ: वह एक ही परमात्मा है, उसके समान दूसरा कोई नहीं है।
७--कैवल्योपनिषद्- १०
“स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।”
भावार्थ: वही परमात्मा ब्रह्मा, शिव और इन्द्र आदि सबका आधार है; वही परम और स्वतंत्र है।
८- नारायणोपनिषद्- ४
“नारायणः परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः।”
भावार्थ: नारायण (परमात्मा) ही परम ज्योति और परम आत्मा है; वही सर्वोच्च सत्ता है।
सार-
उपनिषदों का भी यही मत है कि
परमात्मा एक और अद्वितीय है।
वही सबका पालनकर्ता, रक्षक और सुखदाता है।
उसके समान दूसरा कोई नहीं है।
पुराणों में प्रमाण--
१-भागवतपुराण- १०.१४.५८
“समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं
महत्त्पदं पुण्ययशो मुरारेः।”
भावार्थ: जो लोग भगवान के चरणों का आश्रय लेते हैं, उनके लिए संसार-सागर पार करना सरल हो जाता है; अर्थात् वही वास्तविक आश्रय हैं।
२-विष्णुपुराण- १.२२.५३
“एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।”
भावार्थ: वही एक विष्णु (परमात्मा) सम्पूर्ण जगत में अनेक रूपों में विद्यमान है।
३. शिवपुराण-१.२६
“नास्ति शम्भोः परं किञ्चित्।”
भावार्थ: भगवान शम्भु (परमात्मा) से बढ़कर कोई दूसरी सत्ता नहीं है।
४-पद्मपुराण,उत्तरखण्ड- २३६.१८
“हरिरेव सदा रक्षेत् हरिरेव परायणम्।”
भावार्थ: भगवान ही सदा रक्षा करने वाले और परम आश्रय हैं।
५-गरुड़पुराण- १.२३१.१२
“नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।”
भावार्थ: जो लोग परमात्मा (नारायण) का आश्रय लेते हैं, वे किसी से भय नहीं करते; वही उनका रक्षक है।
६. स्कन्दपुराण- १.२.६.४५
“त्वमेव शरणं नाथ जगतां त्राणकारणम्।”
भावार्थ: हे प्रभु! आप ही सम्पूर्ण जगत के एकमात्र शरण और रक्षक हैं।
७-ब्रह्मपुराण- २३४.३१
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।”
भावार्थ: एक ही परम देव सभी प्राणियों में स्थित है और वही सबका आधार है।
८- नारदपुराण- १.४१.५२
“त्वत्तो नान्यो जगन्नाथ रक्षकः सुखदायकः।”
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपसे बढ़कर कोई दूसरा रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
पुराणों का भी यही निष्कर्ष है कि
परमात्मा ही जगत का वास्तविक रक्षक है।
वही भय और दुःख को दूर करके सुख देने वाला है।
“न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता” (ऋग्वेद) के भाव—कि परमात्मा ही वास्तविक सुखदाता और दुःखों को दूर करने वाला है—का समर्थन Bhagavad Gita में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।
गीता में प्रमाण--
१. गीता १८.६६
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
भावार्थ :
सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों और दुःखों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
अर्थात् परमात्मा ही अंतिम रक्षक और दुःखों को दूर करने वाला है।
२. गीता ९.२२
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
भावार्थ :
जो लोग निरन्तर मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम (आवश्यकताओं और सुरक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
अर्थात् परमात्मा ही अपने भक्तों की रक्षा और कल्याण करता है।
३. गीता ७.१४
“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥”
भावार्थ :
यह मेरी त्रिगुणमयी माया बड़ी कठिन है; परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं वे इसे पार कर लेते हैं।
अर्थात् ईश्वर की शरण ही संसार के दुःखों से मुक्ति का मार्ग है।
४. गीता १०.८
“अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।”
भावार्थ :
मैं ही सम्पूर्ण जगत का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ संचालित होता है।
अर्थात् परमात्मा ही सभी शक्तियों और सुखों का मूल स्रोत है।
५. गीता १२.६–७
“ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः…
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।”
भावार्थ :
जो लोग अपने सभी कर्म मुझे समर्पित करके मेरी शरण लेते हैं, उन्हें मैं जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से निकाल देता हूँ।
सार--
गीता का भी यही सिद्धान्त है कि
परमात्मा ही वास्तविक आश्रय है।
वही भक्तों का रक्षक और पालनकर्ता है।
उसकी शरण से ही दुःखों का नाश और सच्चा सुख प्राप्त होता है।
महाभारत में प्रमाण--
१. भीष्मपर्व ६.६२.३३
“त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव जगदीश्वरः।”
भावार्थ :
हे कृष्ण! आप ही हमारी शरण हैं और आप ही सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं।
अर्थात् परमात्मा ही वास्तविक आश्रय और रक्षक है।
२. शान्तिपर्व १२.३४८.५१
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
भावार्थ :
एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है और वही सबका अन्तर्यामी है।
अर्थात् वही परमात्मा सबका आधार और रक्षक है।
३. वनपर्व ३.३१३.११७
“नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।”
भावार्थ :
नारायण को नमस्कार करके ही सब कार्यों का आरम्भ करना चाहिए; वही परम सहायक हैं।
४. उद्योगपर्व ५.७१.३
“नारायणपरं ब्रह्म नारायणपरं तपः।”
भावार्थ :
नारायण ही परम ब्रह्म हैं और वही सर्वोच्च तप तथा आश्रय हैं।
५. शान्तिपर्व १२.२३७.२४
“नारायणः परं सत्यं नारायणः परा गतिः।”
भावार्थ :
नारायण ही परम सत्य और मनुष्य की सर्वोच्च गति (अंतिम आश्रय) हैं।
६. शान्तिपर्व १२.३२१.२६
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति प्रभुः।”
भावार्थ :
परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित होकर उनका संचालन करता है।
सार-
महाभारत का निष्कर्ष भी यही है कि—परमात्मा ही जगत का वास्तविक स्वामी है।
वही मनुष्य का रक्षक और आश्रय है।
उसी की शरण से दुःखों का नाश और कल्याण होता है।
इस प्रकार महाभारत का सिद्धान्त भी ऋग्वेद की उक्त सूक्ति “न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता” के भाव को पुष्ट करता है कि परमात्मा ही सच्चा रक्षक और सुखदाता है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-मनुस्मृति १२.१२२
“वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्।
इहैव लोके तिष्ठन्नेव ब्रह्मभूयाय कल्पते॥”
भावार्थ: जो मनुष्य परम सत्य (ब्रह्म) को जान लेता है, वही वास्तविक कल्याण और सुख को प्राप्त करता है।
२-याज्ञवल्क्यस्मृति- १.३४८
“ईश्वरप्रणिधानाद्वा सर्वदुःखक्षयो भवेत्।”
भावार्थ: ईश्वर का आश्रय लेने से मनुष्य के दुःखों का नाश होता है।
३-पराशर स्मृति- १.१९
“हरिरेव जगन्नाथः शरण्यः सुखदायकः।”
भावार्थ: परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत का स्वामी, शरण देने वाला और सुख प्रदान करने वाला है।
४-व्यास स्मृति- १.११
“एको देवः सर्वभूतेषु रक्षकः।”
भावार्थ: एक ही परम देव सब प्राणियों का रक्षक है।
५-अत्रि स्मृति- १.७४
“एको देवः सर्वभूतेषु रक्षकः शरणं परम्।”
भावार्थ: एक ही परम देव सब प्राणियों का रक्षक और परम शरण है।
६-दक्ष स्मृति- २.२८
“ईश्वरः सर्वभूतानां नान्यः शरणदायकः।”
भावार्थ: परमात्मा ही सब प्राणियों को शरण देने वाला है, उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
७-गौतम स्मृति- ८.२४
“तमेव शरणं गच्छेत् सर्वभावेन मानवः।”
भावार्थ: मनुष्य को पूर्ण भाव से उसी परमात्मा की शरण में जाना चाहिए।
८-शंख स्मृति- १.६१
“नान्यो जगति रक्षिता सुखदाता च विद्यते।”
भावार्थ: इस जगत में परमात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा वास्तविक रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
स्मृतियों का भी यही मत है कि
परमात्मा ही सबका वास्तविक आश्रय और रक्षक है।
वही सुख देने वाला और दुःखों को दूर करने वाला है।
नैति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-भृतहरि नीतिशतक-८४
“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।”
भावार्थ: संसार के भोग मनुष्य को स्थायी सुख नहीं देते; वास्तविक शान्ति और कल्याण परम सत्य (परमात्मा) की शरण से ही मिलता है।
२-चाणक्य नीति- १५.७
“सुखस्य मूलं धर्मः।”
भावार्थ: वास्तविक सुख का मूल धर्म है, और धर्म का आधार परमात्मा है।
३-शुक्रनीति- १.६६
“ईश्वराश्रयणादेव नित्यं सुखमवाप्यते।”
भावार्थ: परमात्मा का आश्रय लेने से ही मनुष्य को स्थायी सुख प्राप्त होता है।
४-विदुरनीति (उद्योग पर्व)- ३३.२७
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ: धर्म की रक्षा करने वाला मनुष्य सुरक्षित रहता है; धर्म ही उसका रक्षक बनता है, और धर्म का मूल परमात्मा है।
५-हितोपदेश, मित्रलाभ- १.३१
“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।”
भावार्थ: केवल बाहरी साधनों से कल्याण नहीं होता; विवेक और उच्च सत्य का आश्रय ही वास्तविक हित का कारण है।
६-पंचतंत्र- १.२६७
“दैवं पुरुषकारेण यत्नेनापि निवार्यते।”
भावार्थ: दैवी व्यवस्था और परम शक्ति का प्रभाव सर्वोच्च होता है; उसी के अधीन मनुष्य का जीवन चलता है।
७-सुभाषितरत्नभाण्डागार- ९५४
“दैवमेव परं बलं।”
भावार्थ: दैवी शक्ति (परमात्मा) ही सर्वोच्च बल और सहारा है।
८-सदुक्तिकर्णामृत ३.४२
“दैवाधीनं जगत्सर्वम्।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत दैवी शक्ति (परमात्मा) के अधीन है।
सार:
नीति ग्रन्थों का भी यही निष्कर्ष है कि दैवी शक्ति / परमात्मा ही सर्वोच्च आधार है।
मनुष्य का वास्तविक सुख और संरक्षण उसी के आश्रय में है।
उसके बिना स्थायी कल्याण संभव नहीं है।
रामायण और गर्ग संहिता में प्रमाण--
१-वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड -१८.३३
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
भावार्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है कि “मैं आपका हूँ”, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ—यह मेरा व्रत है।
अर्थात् भगवान ही सच्चे रक्षक और आश्रय हैं।
२-अध्यात्म रामायण, अरण्यकाण्ड- २.४०
“राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः।”
भावार्थ: भगवान राम ही परम ब्रह्म और परम आश्रय हैं; वही वास्तविक सुख और कल्याण देने वाले हैं।
३-गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड -१.२३
“त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव जगदीश्वरः।”
भावार्थ: हे कृष्ण! आप ही हमारी शरण और सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं।
४-गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड -९.३८
“त्वत्तो नान्यो जगन्नाथ रक्षकः सुखदायकः।”
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपसे बढ़कर दूसरा कोई रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
रामायण और गर्ग संहिता दोनों का निष्कर्ष है कि—
भगवान ही मनुष्य का परम आश्रय हैं।
वही रक्षक, दुःखों का नाश करने वाले और सच्चा सुख देने वाले हैं।
१- योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण- २.१३
“ब्रह्मैवेदं जगत्सर्वं नान्यत्किञ्चन विद्यते।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है, उसके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है।
२-योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण- ६.२७
“तमेव शरणं यान्ति ये विवेकिनो नराः।”
भावार्थ: विवेकशील मनुष्य उसी परम सत्य (ब्रह्म) की शरण ग्रहण करते हैं।
३- योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण- १.५६
“ब्रह्माश्रयात् परं सुखं नान्यत् विद्यते क्वचित्।”
भावार्थ: ब्रह्म (परमात्मा) के आश्रय से बढ़कर कहीं भी कोई अन्य सुख नहीं है।
सार:
योग वशिष्ठ का सिद्धान्त है कि—
परम ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य और आश्रय है।
उसी के ज्ञान और आश्रय से वास्तविक शान्ति और सुख प्राप्त होता है।
उसके अतिरिक्त कोई दूसरा स्थायी आश्रय नहीं है।
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