समाज में कई लोग यह समझते हैं कि अगर कोई इंसान बहुत कष्ट सह ले, अपमान सह ले और फिर भी चुप रहे,
तो वह बहुत संस्कारी है।
लेकिन सच्चाई यह है कि किसी को कष्ट देना और फिर उसकी सहनशीलता की तारीफ करना, यह इंसानियत नहीं है।
किसी को दुख देकर हम कैसे खुश रह सकते हैं?
अगर मैं ही किसी को कष्ट दूँ और फिर कहूँ कि “देखो, यह कितना संस्कारी है, सब सह लेता है”,
तो यह संस्कार नहीं बल्कि अन्याय है।
भगवान सब देखता है।
जो इंसान दूसरों को कष्ट देता है, उसे अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है—
चाहे देर से ही सही।
इसलिए किसी पर निर्णय देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।
हो सकता है कि जिसकी हम आलोचना कर रहे हैं,
उसकी परिस्थिति और दर्द हमें दिखाई ही न दे रहा हो।
सच्चा संस्कार तो यह है कि हम किसी को दुख न दें,
बल्कि उसकी स्थिति को समझने की कोशिश करें।