यदि पीएम जूरी कोर्ट का प्रस्तावित कानून गेजेट में छाप देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक बता कर रद्द कर देता है, तो क्या किया जा सकता है ?
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जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की कोई भी धारा भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद एवं भारत में लागू किसी भी क़ानून की किसी भी धारा का उलंघन नहीं करती है। यहाँ तक कि पीएम को जूरी कोर्ट गेजेट में निकालने के लिए लोकसभा की अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है। पीएम इस पर हस्तक्षर करके सीधे गेजेट में छाप सकता है। किन्तु यह तकनिकी बिंदु है, व्यवहारिक नहीं।
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व्यवहारिक बिंदु यह है कि यदि पीएम जूरी कोर्ट गेजेट में छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों के पास इस क़ानून को खारिज करने की विवेकाधीन शक्ति है। और इसीलिए यह तय है कि कोई न कोई बहाना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज इसमें अडंगा जरुर लगायेंगे।
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और तब पीएम निम्नलिखित में से कोई या क्रमिक रूप से सभी कदम उठा सकता है :
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(i) पीएम गेजेट में सुप्रीम कोर्ट जज पर वोट वापसी की प्रक्रिया छापेगा। वोट वापसी आने के बाद भारत के नागरिक अमुक सुप्रीम कोर्ट जज को नौकरी से निकाल कर किसी ऐसे व्यक्ति को यह नौकरी दे देंगे जो जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा नहीं लगाए।
(ii) यदि सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज वोट वापसी का क़ानून भी ख़ारिज कर देता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाएगा। पीएम महाभियोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को नौकरी से निकालकर अपने किसी भी वफादार को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है।
(iii) यदि महाभियोग गिर जाता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-भतीजो आदि के खिलाफ सीबीआई लगाकर उलटे सीधे मुकदमे कायम करेगा और उन्हें जेल में डाल देगा। पीएम इसके लिए लोकसभा के प्रस्ताव का इस्तेमाल करेगा। ज्ञातव्य है कि लोकसभा को यह शक्ति है कि वह देश के किसी भी व्यक्ति को बिना कोई मुकदमा चलाये जेल में डाल सकती है। और इसकी अपील अदालत में नहीं की जा सकती।
(iv) पीएम गेजेट में जनमत संग्रह की प्रक्रिया छापेगा, और देश के सामने यह प्रश्न रखेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। यदि 51% मतदाता जनमत संग्रह में “हाँ” दर्ज कर देते है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को निकाल देगा। जनमत संग्रह में यदि कोई प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिर उसे लोकसभा या राज्यसभा द्वारा रोका नहीं जा सकता।
(v) यदि जनमत संग्रह के पास होने के बावजूद सांसद इसमें अडंगा करते है तो पीएम सांसदों पर वोट वापसी का क़ानून छापेगा ताकि नागरिक जूरी कोर्ट का विरोध कर रहे सांसदों को निकाल कर नए सांसद भेज सके।
(vi) यदि सांसद वोट वापसी के दायरे में आने से इनकार करते है तो पीएम लोकसभा भंग करके नए चुनावो की घोषणा करेगा। नए चुनावों में वे सभी सांसद हार जायेंगे जो जूरी कोर्ट के विरोध में थे, और वे प्रत्याशी जीत कर संसद में जायेंगे जो जूरी कोर्ट के समर्थन में है।
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ये सब सीधे तरीके है। इसके अलावा पीएम टेढ़े तरीको का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट जज को काबू कर सकता है :
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पीएम इमरजेंसी का प्रस्ताव पास करेगा, और सुप्रीम कोर्ट बंद करवा देगा। आपातकाल लगाने के बाद पीएम जीतने मर्जी उतने क़ानून छाप सकता है और सुप्रीम कोर्ट इन कानूनों का रिव्यू नहीं कर सकता। आपातकाल लगाने के बाद पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को उसके रिश्तेदारों के एनकाउन्टर वगेरह करने की धमकी भी दे सकता है। पीएम के पास पुलिस और मिलिट्री होती है।
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अत: यदि पीएम बल प्रयोग करने पर आये तो सुप्रीम कोर्ट जज को 2 मिनिट में ठिकाने कर सकता है। हालांकि मेरे विचार में पीएम को आपातकाल लगाकर इस तरह की हिंसात्मक कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है, और न ही उसे इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ऐसे कई सीधे और कानूनी तरीके मौजूद है जिनका इस्तेमाल करके पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट जज को चित कर सकता है।
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यदि पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से यह स्थापित कर देता है कि, सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज नागरिको के बहुमत की मंशा के खिलाफ जा रहा है तो अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) सक्रीय होकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज से मुलाक़ात करने को तत्पर हो जायेंगे। और इससे पहले कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सुप्रीम कोर्ट जज से मुलाक़ात करें सुप्रीम कोर्ट जज या तो इस्तीफा दे देगा या फिर जूरी कोर्ट में अडंगा लगाना बंद कर देगा।
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तो मेरे विचार में सही तरीका यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा लगाते है तो पीएम इस स्थिति को लोकतान्त्रिक तरीके से निपटाए, बल प्रयोग से नहीं।
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(*) अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति स्पष्ट बहुमत के खिलाफ जाता है तो जिन भी लोगो में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी का अंश है वे लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी अपने विवेक से सही गलत का फैसला नहीं करते। वे बस लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करते है।
अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल जी धींगरा, अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद आदि उधम सिंह जी के ही प्रकार थे, और गोरो द्वारा लोकतंत्र की अवहेलना किये जाने के कारण वे अपने अपने तरीके से विभिन्न परिस्थितियों में गोरो से मुलाक़ात करते रहते थे।
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काम की बात : लोकतान्त्रिक तरीके से पीएम सिर्फ तभी आगे बढ़ पायेगा जब कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करें। यदि देश के नागरिको को जूरी कोर्ट के क़ानून के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और न ही कार्यकर्ताओ में इस क़ानून का समर्थन मौजूद है, तो पीएम को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा, और पीएम सुप्रीम कोर्ट जज के आगे टिक नहीं पायेगा।
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वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट जज को पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन प्राप्त है। अत: जब सुप्रीम कोर्ट जज जूरी कोर्ट को ख़ारिज करेगा तो देश के सभी मीडिया हाउस, सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता, सभी सांसद, सभी पेड बुद्धिजीवी, सभी पेड संविधान विशेषग्य, सभी पेड कलाकार आदि सुप्रीम कोर्ट जज के पक्ष में एवं जूरी कोर्ट केविरोध में खड़े हो जायेंगे।
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आम असूचित नागरिक पेड मीडिया द्वारा संचालित इस गिरोह की चपेट में आकर पीएम के कदम का विरोध करना शुरू कर देंगे, या कम से कम पीएम का समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में पीएम इस गिरोह से निपट नहीं सकता। पीएम इस गैंग से सिर्फ तब निपट सकता है जब पीएम को कम से कम 8 से 10 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल हो, जो जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट के समर्थन में है, और पेड मीडिया की गिरफ्त से बाहर है।
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सार यह है कि, जूरी कोर्ट जैसा क़ानून पीएम के चाहने भर से रातों रात देश में लागू नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ एक रूट यह है कि बिना पेड मीडिया की सहायता के भारत में कम से कम 10 लाख कार्यकर्ताओ को जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करने के लिए तैयार किया जाए। और 10 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के लिए कम से कम 10 करोड़ नागरिको तक जूरी कोर्ट ड्राफ्ट की जानकारी पहुंचानी होगी। वो भी पेड मीडिया के बिना। जाहिर है, यह काफी दुरूह एवं लम्बी प्रक्रिया है। यह काम तब और भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक जूरी ट्रायल के बारे में गलत एवं अधूरी सूचनाएं देकर लोगो को लगातार भ्रमित करते रहने वाले है।
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जूरी कोर्ट जैसे क़ानून को गेजेट में छपवाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है। इसे पढ़े -- Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या भारत सुपर पावर बन सकता है? कैसे और कब? नागरिकों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
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मेरा मानना है कि, जूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है -
थॉमस जेफरसन ( अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणा पत्र के लेखक )
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