Hindi Quote in Poem by PRASANG

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बदलते रिश्ते।

एक वक़्त होता था जब तुम्हारी ज़रूरत थी हमें,
अगर तुम खुदा भी हो तो इबादत कहाँ है हमें।

न सुकूँ दिल को मिला, न आरज़ू का कोई रंग,
सूने इस शहर में अब वो रौनक कहाँ है हमें।

तुमने बदली हैं दिशाएँ भी बड़े सलीके से,
अपनी ही चाहत से मिलती राहत कहाँ है हमें।

मुस्कुराकर जो दिए तुमने वो गहरे ज़ख़्म,
उनसे फिर आज कोई शिकायत कहाँ है हमें।

जो थे कल तक क़रीब, आज पराये-से लगें,
इस बदलते हुए दौर से हैरत कहाँ है हमें।

तन्हाई से निभा ली है हमने हर एक घड़ी,
अब किसी बज़्म की कोई ज़रूरत कहाँ है हमें।

पाकर भी तुमको खोना अजब दास्ताँ ठहरी,
किसी और को पाने की हसरत कहाँ है हमें।

दिल ने छोड़ी हैं सभी उम्मीद की राहें अब,
किसी रौशन सवेरे की आरज़ू कहाँ है हमें।

‘प्रसंग’ अब तो ख़ुदी से भी अजनबी-से हुए,
ख़ुद से मिलने की कोई फ़ुर्सत कहाँ है हमें।

- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

Hindi Poem by PRASANG : 112021610
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