मैं एक नदी की तरह बिना सोचे समझे बस बहती जा रही थी क्योंकि,
मुझे जाना था उस एक समंदर में समाना था ।
कितने पत्थरों से टकराई चोट खाई पर अपने आप को रोक न पाई।
कितने कांटे उलझे मेरे दामन में पर मेरा मन था बस उस एक समंदर में समाने में।
जाने कब एक झरना मुझ में समा गया मेरी धारा को अविरल बना गया।
कुछ पुष्प मेरे आंचल में समा गये मेरी धारा की खूबसूरती को बड़ा गये।
पर मैंने किसी पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि मुझे जाना था उस समंदर में मिलना था समाना था।
मैंने सबको नजर अंदाज किया अपने आप को भी।
फिर 'वो' क्यों ना करता मुझे नजरअंदाज।
मैं फिर भी उससे मिली और अस्तित्वहीन हो गई,
'वो' समंदर था गहरा था उसमें दूसरी नदी का बसेरा था।
- Soni shakya