जीवन के तीन उत्सव
जन्म विवाह और मृत्यु
पहला जन्म का उत्सव स्वयं नही मनाता घर वाले मनाते हैं । यह महत्वपूर्ण इस लिए है इसमे परिवार मे बढोतरी होती है , विवाह मे भी बढोतरी होती है इसमे स्वयं की सहभागिता महसूस होती है । यह रहन सहन आचार विचार मे परिवर्तन लाता है । तीसरा है मृत्यु का उत्सव, इसम भीे स्वयं की सहभागिता रहती है उत्सव की अनुभूति होती है या नही कह नही सकते । इन उत्सवो की समानता देखो एक मे थाली बजती है दूसरे मे ढोल बजता है तीसरे मे शंख घड़ावल बजता है । फर्क इतना है दो मे संयोग होता है तीसरे मे वियोग होता है । दो मे हंसी खुशी नृत्य गीत होते है तीसरे मे रूदन होता है ।
आध्यात्मिक रूप से देखे तो त्रिमूर्ति ब्रह्मा का निर्माण वृद्धि, पालन संहार दिखाई देते हैं । मृत्यु के भय से ही दर्शन शास्त्र का ज्ञान होता है ।