ख़्वाहिश-ए-मुस्तक़िल (ठहराव की तलाश)......✍️
मांग क्या थी मेरी, और मुझको क्या-क्या चाहिए था,
मैं एक दरिया ठहराव सा, मुझको साहिल चाहिए था।
वो मौज बनकर आया था, बस छूकर हमें गुज़र गया,
मुझे तो सदियों का कोई, हमसफ़र मुस्तक़िल चाहिए था।
कैसे बनेगी ये कहानी, जो आवाज़ उठी है मन में,
ये दास्तां थी मेरी, इसे तो खुद मुझे लिखना चाहिए था।
-MASHAALLHA
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