Hindi Quote in Poem by AbhiNisha

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ऐ साम तुम्हें देखने से डरने लगीहूं
कविता पार्ट 1



ऐ साम तुमे देखने से अब डरने लगी हुं मैं
जाने क्यों अब अपनी ही आजादी से तकराने लगी हूं मैं

ऐ साम तुम्हें देखने से डरने लगी हूं मैं
जाने क्यों अपने ही आजादी से तकराने लगी हूं मैं


वह ख्वाब जो मैं ने देखी थी
हवा बन कर बस बेहते रहना
उस ख्वाब से मुकरने लगी हूं मैं

ऐ साम तुम्हें देखने से डर नहीं लगी हूं मैं




लगता है कि मेरे उड़ान में जंग लग गई है
उन निगाहों की जो मुझे नोच कर खा जाना चाहती है


अब लगता है कि मेरी आजाद सोच
सीकोड़ कर बंद कमरों में सिमट जाने लगी है



अब मुझे डर खुद से ज्यादा
इस समाज की दरिंदगी भरी निगाहों से
और इस पितृसत्ता वाली सोचो से लगने लगी है
और जीने से




मै डर से बेरिया पहनकर बंद कमरों में कैद हो जाना चाहती हूं
मैं छोड़ देना चाहती हूं
अपनी चाहते अपने जीद्द अपने सपनों को
और खुद के अंदर खुद को दफना कर
मुर्दा बन जाना चाहती हूं



ऐ रात अब खोप खाने लगे हु
ं तुमसे नजरे मिलाने से


मेरी वह आज़ाद ख्याल
फिर से उस बचपन में लौट गई है
जब मैं डर से घबरा कर
आंखें बंद कर लेना चाहती थी
और चाहती थी यह समय बित जाऐ



अब मुझ में बेवाकी नहीं रही
अब लोगों की बातें मुझे खुद में डालने लगी है
पहले की तरह मैं फिर से खुद को खो रही हूं
मैं खुद में कैद होने लगी हूं
मैं मुझे भुल चुकी हूं
आखिर मुझे मे वो बेबाकी कैसा थी
और मैं हूं कौन


एक लड़की जो हमेशा समाज की दवाऊ में आकर
खुद को मार कर
अपने पांव में बेरिया पहन लेती है
और कैद हो जाती है घर की चार दिवारीयों में



यह एक आजाद आत्मा
जो हमेशा उड़ जाना चाहती है
भगाना चाहती है
जीना चाहती है
सुनना चाहती है सोचना चाहती है
सीखना चाहती है पढ़ना चाहते हैं
और इस दुनिया को अनुभव करना चाहती है




पर जो मैं आजकल अनुभव कर रही हूं
वह डरावना ख्वाब से काम नहीं
पर यह हकीकत है
और यह मुझे अंदर से मार रही है




एक चेतना के अंदर डरना मतलब
उसके अस्तित्व खो जाना
उसका मर जाना
और मैं अपने अस्तित्व खो रही हूं
मैं अंदर से मार रही हूं

ऐ सुवा मुझे चेतावनी देने लगे हैं
अपनी कदम आगे बढ़ने से
मजबूर कर देती है
वही कदम ठहरने से

Hindi Poem by AbhiNisha : 112025937
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