तू मेरा क्यों नहीं हो सका, एक रात एक बात लिखूंगा,
मैं कोरे कागज़ पर अपने दिल के सारे जज़्बात लिखूंगा।
नज़्म: अधूरी रात की बात
वो सवाल जो अक्सर जागता है...
तुझे चाहा था ख़ुदा की तरह, ये मेरी ख़ता थी शायद,
तू मिला भी तो एक ख़्वाब की तरह, जो सुबह होते ही खो गया।
मैं अपनी वफ़ा, तेरी बेरुखी का हर एक हिसाब लिखूंगा,
तू मेरा क्यों नहीं हो सका, एक रात एक बात लिखूंगा।
वो लम्हा जो ठहर गया...
हाथों में हाथ थे तेरे, और आँखों में झूठे वादे,
समझ न सका मैं वो चालाकी, जो छिपी थी तेरे सादे अंदाज़ में।
मैं उस आख़िरी मुलाक़ात की तड़प, वो आख़िरी रात लिखूंगा,
तू मेरा क्यों नहीं हो सका, एक रात एक बात लिखूंगा।
दर्द का समंदर...
ज़माने को तो हँस कर दिखाया है हमेशा मैंने,
पर अकेले में जो रोया है दिल, वो भीगी बरसात लिखूंगा।
गिला नहीं कि तू मेरा न हुआ, बस अपनी किस्मत का लिखा,
मैं अपनी मोहब्बत की हार, और तेरी जीत की बात लिखूंगा।
"क़लम जब भी उठती है, बस तेरा ही ज़िक्र होता है,
तूने तो भुला दिया, पर इस दिल को आज भी तेरा फ़िक्र होता है।"