“विरह मीरा सी” ………
पूजूँ मैं राम को…
या पूजूँ मैं श्याम को…
पर सच कहूँ
मेरे दिल में
एक मूरत तेरी भी बसती है।
मीरा ने जिस दर्द में कृष्ण को पुकारा,
राधा ने जिस विरह में साँस ली
वैसी ही एक अधूरी सी प्रीत
मेरे भीतर
तेरे नाम से धड़कती है।
तू माने या न माने,
ये कोई दिखावा नहीं है
मेरी हर साँस
अनजाने में
तेरा ही जप करती है।
मैं जोगन हूँ तेरी प्रीत में,
कोई चोला नहीं पहना,
पर दिल ने सब छोड़ दिया है।
और तू…
तू चाहे मुझे अपना माने या नहीं,
पर मेरे मन को मंदिर बनने के लिए
तेरी ही ज़रूरत है।
प्राची तंवर…..