" शहर-ए-तन्हाई "
इश्क़ के शहर में तन्हा हो गए।
मिलकर भी उनसे जुदा हो गए।
इश्क़ में उनके हम क्या बताएँ?
क्या थे और अब क्या हो गए।
वो तो खामोश रहकर निकल गए,
हम ही महफ़िल में रुसवा हो गए।
माँगी थी हमने जिनसे वफ़ा,
वो ही हमसे अब खफ़ा हो गए।
दिल के ज़ख़्म छुपाते-छुपाते,
खुद ही हम एक दास्ताँ हो गए।
खुद को खोकर पाया है उनको,
हम तो उन पर ही फ़ना हो गए।
छोड़ गए उनका ज़िक्र ही क्या?
जो मुसाफ़िर थे, जुदा हो गए।
देखते ही रह गए ता-उम्र 'व्योम',
ना जाने कब वो हवा हो गए।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.