कविता
धड़कन उम्मीद मांगती है
धड़कनें के लिए
धड़कन उम्मीद मांगती है
धड़कने के लिए
पर मुझे पता है
मेरे पास धड़कन से कहने के लिए
कुछ भी ऐसा नहीं है
कि मैं कहूं तू
धड़क तेरा भी कोई अपना है
तू धड़क तुझे भी कोई प्यार करता है
तू धड़क तेरे साथ कोई चलना चाहता है
हु। ॽ
तू धड़क मेरे सपने हैं
तू धड़क मुझे उम्मीद है
तू धड़क में जीना चाहती हूं
मेरे पास कोई ऐसी लव्जी नहीं है
धड़कन को कहने के लिए
कि
तू धड़क रोने पर तुम्हें गले लगाने वाला लोग भी है
हां
झूठी उम्मीद देना अपने धड़कन को
अपने धड़कन के लिए ना इंसाफी है
काश मैं और जीने के लिए धड़कन से कहती
तू धड़क तेरी दुनिया में बहुत लोग हैं
बहुत सारे सपने हैं
बहुत सी चीज तुम्हें करनी है
पर मैं कहती हूं
तू रुक जा
मेरे पास झूठी उम्मीद देने के लिए
कुछ भी नहीं
मैं लिख पाती झूठी लब्ज भी नहीं
तू रुक जा
और ठहर ठहर के चलने की वजह
तू रुक जा
बेवजह मुझे जिंदा रखने के लिए परेशान होने की वजह
तू रुक जा
मेरी बेकार की भावनाएं तुझे और थका दे
इससे पहले तूरुक जा
तू रुक जा
मुझे जिंदा रखने की जिद्दो जोहद मत कर
तू रुक जा
यह दुनिया बहुत बड़ी है
और हसीन भी
पर तुम्हारे लिए यहां कुछ भी नहीं है
सच यही है
बेकार की मुझसे उम्मीद मत रख
कि मैं फिर से उठो
और जीना चाहूं गी
तू रुक जा
और इतना संघर्ष करना बंद कर
तुझे पता है ना
एक दिन में खुद को मार डालूंगी
और तुझे भी दर्द पहुंचाऊंगी
तुम्हें मेरी आखिरी घड़ी तो पता है ना
इसी लिए तू रुक जा
हां मैं चाहती हूं
कि मेरे मौत मेरे ही हाथों है
पर इस बीच
कितनी दर्द कितनी संघर्ष कितनी घुटन
कितनी तरफ कितनी बेचैनी
और कितनी दर्द बर्दाश्त करनी होगी
तुम्हें पता है ना
इसलिए बस कर
तू रुक जा
गजल
ना उम्मीद किनारा है
ना कोई सहारा है
ठेहर ठेहर कर तू चलता है
ना कभी बिगड़ता है
इतना बड़ा दिल मत रख
बस मेरे लिए
तू रुक जा बस तेरे लिए