मैं और मेरे अह्सास
दामिनी
कल तक अनजान थे आज हमसफ़र हो गये l
देखते ही देखते आज दामिनी रहबर हो गये ll
वक़्त भी क्या दिन दिखलाता रहता है अक्सर l
रहते थे सदा अक्कड़ आज मयस्सर हो गये ll
कुदरत की कारीगरी कहो या फिर कृपा कहो l
रेत के सूखे रण पल भर में समंदर हो गये ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह