मैं और मेरे अह्सास
पडोश नी बंध खिड़की
पडोश की बंध खिड़की खुलेगी तो नज़ारा लाजबाब होगा l
पर्दे के पीछे चश्मे बद्दूर ताज़ा खिला हुआ
गुलाब होगा ll
कई दिनों से बंध खिड़की खुलने का ही
इंतजार कर रहे l
एक हल्की झलक से भी मुकम्मल पूरा
ख्वाब होगा ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह