📖" किताब-ए-इश्क़ " 📖
चल रहा है ज़िंदगी में ना जाने सिलसिला कैसा।
न जाने राह में हमको यार मिला तो मिला कैसा।
किया था प्यार अगर उनसे तो खुद ही किया हमने,
तो फिर अब उनसे रखें हम शिकवा-गिला कैसा।
बहारें आ गईं गुलशन में हर इक फूल भी महका,
पर उम्मीद का दिल में गुल खिला तो खिला कैसा।
मिटा दीं हसरतें दिल की मगर वो खुश नहीं हुए,
हमारी वफ़ा का हमको मिला है यह सिला कैसा।
जो कल तक धड़कता था बस हमारे सीने में ही,
धड़क रहा है अब दिल आज यह बे-दिला कैसा।
अधूरी ही छोड़ दी थी तुमने हमारे प्यार की दास्ताँ,
तो फीर किताब-ए-इश्क़ में नाम लिखा मिला कैसा।
अकेले ही गुज़ारनी है हमें जब यह ज़िंदगी 'व्योम',
तो फिर आँखों के आगे ख़्वाबों का काफ़िला कैसा।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर।