इगो एंड कबाड़ लिमिटेड की समीक्षा
कभी व्यंग्य उपन्यास लेखन की जमीन पर अपनी उपस्थिति दर्ज करना बहुत बड़ी चुनौती लगता था। श्रीलाल शुक्ल का ' राग दरबारी ' व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले के साहस को चुनौती देता था। ये एक कठिन कर्म माना जाता था। व्यंग्य लिखना तो वैसे ही चुनौतीपूर्ण है और व्यंग्यकार इसे स्वीकार करता रहा है। अनेक व्यंग्यकारों ने इसे स्वीकार किया और अपने गुणवत्तापूर्ण व्यंग्य उपन्यासों द्वारा हिंदी व्यंग्य साहित्य को समृद्ध किया। रमेश मेहंदीरत्ता ने ' ईगो एंड कबाड़ लिमिटेड ' लिखकर यही रचनात्मक कर्म किया है। आरम्भ से ही लगने लगता है कि जैसे आप व्यंग्य के उपवन में आ गए हैं और विसंगतियों पर आक्रमण पर व्यंग्य की गंध आपके नथुनों को निरंतर तरोताजा करने वाली है।
रमेश मेहंदीरत्ता ने अपने लक्ष्य और रचना के कथ्य की ओर संकेत भूमिका में दे दिया है। वे लिखते हैं, " जब पूरा सिस्टम मिलकर किसी ईमानदार और सीधे इंसान की रीढ़ की हड्डी तोड़ने पर तुल जाए, तो हार मानकर कबाड़ नहीं होना चाहिए। यह उपन्यास एक मार्गदर्शिका है कि कैसे अपने शांत स्वाभिमान और देश के कानून के बल पर पूरे भ्रष्ट तंत्र की चूलें हिलाकर वापस अपना प्रमोशन और हक़ छीना जाता है। इसमें 'सुपरसीड करने कराने' और चापलूसी के उन जमीनी व सामाजिक पहलुओं को उजागर किया गया है जो हमारे दफ्तरों का कड़वा सच हैं। ... न्याय कोई भीख नहीं है, इसे कभी कभी छीन कर लेना भी पड़ता है। मैं उन तमाम पाठकों का आभारी रहूंगा जो इस व्यंग्य के ज़रिए अपने दफ्तर के किसी 'शर्मा जी', किसी 'चम्पक लाल' या किसी 'खूबचंद' को ढूंढ पाएंगे।"
ये व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य के परंपरागत विषयों से अलग हटकर विसंगतियों को प्रत्यक्ष करता है। इसका समर्पण भी अलग है। समर्पण लेखक के सामाजिक सरोकारों को चिन्हित करने वाला है। रमेश मेहंदीरत्ता लिखते हैं,"यह किताब सादर समर्पित है देश के उन तमाम निष्ठावान, कर्मठ औ सीधे सादे कर्मचारियों को, जिन्होंने व्यवस्था के वातानुकूलित कमर में होने वाले पक्षपात और चमचागिरी के आगे कभी घुटने नहीं टेके।
यह उन स्वाभिमानी चेहरों को समर्पित है, जिनकी रीढ़ अनुचित दबाव और असुरक्षित आकाओं के इगो के सामने हमेशा कड़क और सीध रही।
यह समर्पण है हर उस 'खूबचंद' के नाम, जो कबाड़खाने में धकेले जाने के बाद भी अपनी ईमानदारी की रोशनी से सच का सवेरा लान जानते हैं।" प्रेम जनमेजय (प्रसिद्ध व्यंग्यकार)