मुक्तक
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दोहा मुक्तक
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रोजी-रोटी के लिए, भटक रहे हैं लोग।
कुछ की खातिर है यही, सबसे भारी रोग।
कुछ का अच्छा भाग्य है, कुछ का है दुर्भाग्य-
ईश्वर की इच्छा प्रबल, या फिर है संयोग।।
रोजी-रोटी के लिए, छोड़ रहे घर-बार।
यह कैसी बेचारगी, बेबस है परिवार।
जीवन यापन के लिए, सहना पड़ता दंश-
व्यर्थ तनावों का भला, आप बताओ सार।।
शिक्षक का सम्मान अब, कितना होता आज।
नित-नित छीना जा रहा, उनका गौरव ताज।
कहें मित्र यमराज जी, आया कैसा दौर -
सोच रहे बस रात-दिन, बची रहे मम लाज।।
शिक्षक तो हैं हम सभी, मगर नहीं है ज्ञान।
इसीलिए बन घूमते, गाते झूठा गान।
कभी नहीं हैं चेतते, प्रश्न बड़ा गंभीर -
नित उड़ते उपहास को, मान रहे वरदान।।
कलियुग के कौरव सभी, उछल रहे हैं आज।
हम सब भी हैं जानते, क्या है इसका राज।
सारी दुनिया चाहती, आएँ अब श्री कृष्ण -
केवल उनके हाथ में, गिरा सकें जो ताज।।
क्षणिक सफलता से नहीं, मंत्रमुग्ध हों आप।
जारी रहिए कर्म का, आप निरंतर जाप।
भले लोग कुछ भी कहें, मत देना तुम ध्यान-
तब जीवन खुशहाल हो, बिना किसी अभिशाप।।
आज अमावस की निशा, सूना है आकाश।
हृदय दीप जलाइए, होगा नवल प्रकाश।
मिट जाए सारा तिमिर, नहीं छोड़ना धैर्य-
इंतजार बस कीजिए, नूतन प्रात उजास।।
चंदा रूठा गगन में, तारे हुए मलीन।
आई रात अमावसी, रंग रुप से हीन।
एक दिया है लड़ रहा, सारे तय से आज-
मन में रख विश्वास तू, बनते क्यों है दीन।।
धन जोड़ा छल कपट से, समझा सुख का लोक।
जाना खाली हाथ हैं, बिगड़ेगा परलोक।
माया के आधीन हो, करता है क्यों दंभ-
ज्ञान चक्षु को खोल रख, दूर रहे तब शोक।।
आज हकीकत से सभी, लेते हैं मुँह मोड़।
जान-बूझकर ढ़ूँढ़ते, इसका कोई तोड़।
डरते कब हैं लोग अब, रचने में षड्यंत्र -
केवल इतना चाहते, हो बस अपना जोड़।।
आने वाले समय में, ज्ञदेगा कष्ट तुषार।
नियम प्रकृति का है यही, समझो जीवन सार।
रहना पड़ेगा मित्रवर, सबको अपना ध्यान -
मुश्किल होगा तब बड़ी, व्यर्थ किया तकरार।।
संंतो का संगम जहाँ, वहाँ करो मत खेल।
कोशिश जितनी आपकी, सब होनी है फेल।।
कहें मित्र यमराज जी, छोड़ो व्यर्थ गुमान -
वरना जाकर बेंचिए, घूम-घूमकर तेल।।
आते तो हर वर्ष हैं, श्रीगणेश भगवान।
मगर नहीं हम जानते, जो है इसका ज्ञान।।
दुर्गति करते खूब हैं, जो दस दिन के बाद-
इसीलिए क्या हम सभी, करते बड़ा गुमान।।
वंदन श्री गणेश को, शीश झुकाते नित्य।
पूरे उसके काज सब, बिना किसी औचित्य।
विघ्न हरण दे ध्यान तब, रिद्धि सिद्धि के संग-
प्रथम पूज्य गणपति जी, बनते हैं आदित्य।।
गाँवों में भी आजकल, होते नित्य विवाद।
बीते दिन की अब भला, आती किसको याद।
शहरों में जो विष पले, गाँवों तक विस्तार-
सुनता किसकी कौन है, दाना पानी खाद।।
अपवादों को छोड़िए, प्यारा लगता गाँव।
रहते हैं सब प्रेम से, चाहे जितना घाँव।
सुख-दुख मिलकर बाँटते, भूल सभी मतभेद -
जिंदा अब भी गाँव में, दिखता है सद्भाव।।
पीपल बिन चौपाल अब, गाँव संग वीरान।
काट रहे सब मौन हो, किसको अब है ध्यान।
जिसके पत्तों पर लिखा, था अनुभव का मंत्र-
जड़ गहरी शाखें बड़ी, जस बुजुर्ग का ज्ञान।।
करना क्यों विश्वास ही, जब धोखों का दंश।
वैसे मिलता है सदा, सबको अपना अंश।
जब इतना सब है पता, फिर किसका है दोष-
यही हमारे आपके, जीवन का अपभ्रंश।।
संगत का होता असर, जान रहे हैं लोग।
फिर भी जाने क्यों भला, ले लेते अभियोग।
इस मूरखता को भला, कैसे कह दें भूल-
हम तो इसको मानते, लाइलाज है रोग।।
भक्ति शक्ति के मेल का, जो होता परिणाम।
उससे बन जाते सदा, अपने सारे काम।
जो अपने आराध्य पर, रखता है विश्वास-
उसका होता जगत में, इक दिन ऊँचा नाम।।
ईश्वर की चाहो कृपा, भक्ति कीजिए आप।
मुश्किल हो कितनी बड़ी, करना तुम मत पाप।
बाधा तो आती सदा, मत करना परवाह-
मिट जाएगा एक दिन, तव जीवन संताप।।
सच्चा साथी दे सदा, जीवन को आधार।
जिसके बिन सूना लगे, अपना ये संसार।
होना इतना चाहिए, दूजे पर विश्वास -
जीवन पथ होता सुगम, खुशियां मिले अपार।।
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पितरों का तर्पण करो, दे जल अक्षत फूल।
उनके ही आशीष से, मिटे हृदय के शूल।।
भूल-चूक होंगे क्षमा, शीश झुकाएँ आप-
छूमंतर होंगे सभी, दुख पीड़ा बन धूल।।
तर्पण श्रद्धा भाव है, नहीं मात्र यह कर्म।
पितरों का आशीष ही, इसका पावन मर्म।।
नादानी अब छोड़ दो, यही समय की माँग-
पूर्ण समर्पण से करो, जो है अपना धर्म।।
बेमौसम बरसात से, चिंतित सारे लोग।
यह तो ऐसा लग रहा, व्यर्थ लगा अभियोग।
प्रभु जी लीला आपकी, जाने नहीं जहान-
रो-रोकर है सोचता, मुफ्त मिला क्यों रोग।।
संयोजन करना नहीं, होता कोई खेल।
माथा-पच्ची संग में, करना पड़ता मेल।।
सबके वश की बात यह, कब होती आसान-
कुछ तो औंधे मुँह गिरे, जैसे तरु से बेल।।
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हिंदी दिवस
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हिंदी भाषा का करें, आप सभी सम्मान।
बात हमारी मानिए, नहीं आपको ज्ञान।
नहीं राष्ट्र भाषा बनी, रखिए इतना याद-
चिंता मत करिए मगर, भाषा हिंदी गान।।
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रोला मुक्तक
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कटे सकल संताप, नाम जप नीम करोली।
मिटें जनम के पाप, धाम कैंची की बोली।
जोड़े सबको साथ, राम का मेरे धागा -
हो जाते भव पार, खा रहे हनुमत गोली।।
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सरसी छंद मुक्तक
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कण-कण में भगवान बसे हैं, क्या नूतन है बात।
समझ रहा हर मानव प्राणी, पर दूषित जज़्बात।
जान-बूझकर अकड़ रहा है, करे पाप के कर्म-
प्रभु चरणों में शीश झुकाता, रखता मन प्रतिघात।।
झूठे वादे बाँट रहे हैं, नेता आकर द्वार।
इतना तो वो जान रहे हैं, झूठ-मूठ आधार।
उछल-कूद कर पैर पकड़ते, जोड़ें दोनों हाथ-
एक निवेदन केवल करता, बनवा दो सरकार।।
हमने भी अब सीख लिया है, इस दुनिया की रीत।
रहना सबसे दूर हमें है, नहीं करेंगे प्रीत।
किस्मत से तो हम बच निकले, ईश्वर का आभार -
इससे बढ़कर और भला क्या, हो सकती थी जीत।।
सुधीर श्रीवास्तव