रोला छंद
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व्यर्थ निकलती आह, बंद अब नाटक करिए।
जैसा आपका कर्म, दंड भी वैसा सहिए।।
कहें मित्र यमराज, छोड़िए रोना-धोना।
बस्ती हुई तबाह, बीज फिर नूतन बोना।।२३०
भरते हैं सब आह, आपदा आई भारी।
बस्ती हुई तबाह, नहीं की थी तैयारी।।
नहीं की थी तैयारी, आज तो हम सब डरते।
पाप घड़े में पुण्य, सभी मिलकर हैं भरते।।२३१
पोषण करते ईश, भोज्य अनेक हैं देते।
सबको नूतन राह, भले हम सब ना चेतें।।
कहें मित्र यमराज, नहीं करना तुम शोषण।
ईश्वर पर विश्वास, सभी का होगा पोषण।।२३२
आज बड़ी उपलब्धि, दूर अब हुआ कुपोषण।
बात अलग है और, आज भी होता शोषण।।
कहें मित्र यमराज, दोष हम सबका भारी।
फिर भी देना दोष, मानसिक है बीमारी।।२३३
दुर्घटना के बाद, तंत्र सब जागृति होते।
मजबूरी है यार, चैन से कब वे सोते।।
कहें मित्र यमराज, रोज होती दुर्घटना।
बेचारों को रोज, रात-दिन पड़ता खटना।।२३४
मिले कहाँ आराम, बात कहते हो सच्ची।
जीवन में है आज, बहुत ही माथा-पच्ची।।
कहें मित्र यमराज, चलो बनने सन्यासी।
मिले बहुत आराम, काम बस आप उबासी।।२३५
भक्ति भाव हो प्रबल, व्यर्थ चिंता कब होती।
रखते प्रभु जी ध्यान, नहीं चाहें हम मोती।।
कहें मित्र यमराज, प्रार्थना सबकी सुनते।
रखते जो विश्वास, साथ उनके ही रहते।।२३६
शिक्षक सदा महान, ज्ञान देता है उत्तम।
उनका आशीर्वाद, शिष्य बनता सर्वोत्तम।।
कहें मित्र यमराज, चरण हमइनके पूजें।
देते राह प्रकाश, मानते अपने चूजे।।२३७
शिक्षक जीवन मित्र, जानते हम सब इतना।
पर इनको सम्मान, आज हम देते कितना।।
कहें मित्र यमराज, भूल करते हम भारी।
जिसका है परिणाम, लगे निज जीवन खारी।।२३८
दूँगा यही सलाह, आज मित्रों मैं सबको।
नमन करूँ सौ बार, सोचना होगा हमको।।
सोचना होगा हमको, विनय बस यही करूँगा।
आप करो विश्वास, फीस भी इसकी दूँगा।।२३९
विधि का अजब विधान, आप मानो मत मानो।
सबसे ऊपर आप, भले ही खुद को जानो।।
कहें मित्र यमराज, खेल दिखता नित उसका।
हम सब कहते रोज,अजब विधान है विधि का।।२४०
नफरत की दीवार, नित्य है खींची जाती।
कुछ लोगों का स्वार्थ, टूटती जाए थाती।
कहें मित्र यमराज, देखते जाओ प्यारे।
या फिर छीलो घास, रहो बनकर घसियारे।।२४१
भ्रम में चाहो आप, डूबकर खोजो सोना।
बस रहना तैयार, प्यार से कल तुम रोना।।
कहें मित्र यमराज, कौन रोकेगा तुमको।
फुर्सत किसको आज, काम है ढेरों सबको।।२४२
हिंदी बड़ी महान, सितंबर चौदह आया।
करती गौरव गान, हमें है खूब सुहाया।।
पुस्तक सज्जा साज, हिंद संस्कृति की काया।
बन अक्षर से शब्द, आप हमने अपनाया।।२४३
हिंदी गुणों की खान, जानते भारतवासी।
करो नहीं तकरार, बनो मत तुम वनवासी।।
कहें मित्र यमराज, देश की भाषा हिंदी।
चमक रहा है भाल, राष्ट्र गौरव बन बिंदी।।२४४
नहीं दीन दिव्यांग, भले उसकी लाचारी।
दे कब ईश्वर दोष, भले हर दिन है भारी।
कहें मित्र यमराज, हौसला भी तो रखता।
बिन माने दिव्यांग, स्वाद मीठा फल चखता।।२४५
ऐसी करनी कीजिए, लगे लोगों को सुंदर।
बन जाओगे आप, बिना कुछ कहे धुरंधर।।
कहें मित्र यमराज, जगत में होगी चर्चा।
क्या है इसका राज, खोज होगी तब पर्चा।।२४६
मिला न सच्चा मीत, प्रश्न क्या इतना भारी।
समझ रहे क्यों आप, भला इसको बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ है भावुक होना।
रहो आप तैयार, चाहते कल यदि रोना।।२४७
संकट हरो गणेश, कहूँ मैं केवल इतना।
चाह रहे सब एक, नहीं कोई दुर्घटना।।
कहें मित्र यमराज, नाथ नखरे अब छोड़ो।
हर प्राणी की राह, सुखद चौराहा जोड़ो।।२४८
नमक-मिर्च का स्वाद , नहीं जिसने है जाना।
गाते भौंड़ा राग, भला इसको क्या खाना।।
कहें मित्र यमराज, करोगे तब तुम यारी।
इसके सेवन संग, दूर होगी बीमारी।।२४९
ध्यान दीजिए आप, प्रकृति का जो संदेशा।
वरना इक-दिन सत्य, बनेगा रेशा-रेशा।।
कहें मित्र यमराज, आप नादान न बनिए।
जीवन हो खुशहाल, प्यार हरियाली चुनिए।।२५०
धोखा देना काम, आज है बहुत जरूरी।
जिसके पास दिमाग, समझते हैं मजबूरी।।
चलें समय के साथ, आप मूरख मत बनिए।
यही गुरू का ज्ञान, देखकर नीचे चलिए।।२५१
क्यों करता तकरार, भला हमको बतलाओ।
ठाने रहते रार, तनिक ये भी समझाओ।।
कहें मित्र यमराज, राज क्या कैसे इसका।
होता किसका लाभ, नाम बतलाओ उसका।।२५२
खड़ा अकेला पूत, खेत में बना बिजूका।
गायब धड़ से शीश, लगे जैसे हो चूका।।
कहें मित्र यमराज, धैर्य से बैठी चिड़िया।
उसे कहाँ है बोध, नहीं है उसकी पिड़िया।।२५३
तुलसी दल उपयोग, सदा पूजन में होता।
पावनता परिवेश, लगाता सुंदर गोता।।
कहें मित्र यमराज, निराली इसकी माया।
हो जाता कल्याण, कृपा तुलसी जो पाया।।२५४
जिसका हमको खेद, हमें क्यों ऐसा करना।
करिए कभी न भेद, नहीं नाहक में डरना।।
कहें मित्र यमराज, नहीं रचना तुम माया।
स्वार्थ लोभ का खेल, भयानक दुख का साया।।२५५
संगम अपना स्वार्थ, नहीं हम मूरख भाई।
गाते रहिए आप, भले जो आप सुहाई।।
कहें मित्र यमराज, मूर्ख बनकर तुम घूमो।
अपनी है सरकार,जिसे चाहो जब चूमो।।२५६
जीवन का अनुवाद, प्रेम से जो कर लेता।
उसको होता बोध, भाव उत्तम भर देता।।
सद्गुरु देते ज्ञान, आप ही होता नीमन।
रहे सदा खुशहाल, सभी का अपना जीवन।।२५७
सुधीर श्रीवास्तव