आँखों में क्रोध, हृदय में प्यार,
इंक़लाब मेरी पहचान है।
मुझे बर्दाश्त नहीं जुल्म को देखना,
जुल्मी जुल्म करेगा तो रौंद दूँगा हर जगह।
तुम्हारे जैसा कायर, लाचार नहीं,
जुल्म देख आँख बंद करके रहूँ—
मैं ऐसा इंसान नहीं।
ईश्वर हो या अल्लाह,
मेरी उनसे बनती नहीं...
मुझे गलती से इनसे डराने का कदम न उठाना,
वरना मैं हर जगह तबाही मचा दूँगा...
न मुझे अल्लाह से, न ईश्वर का ख़ौफ़ है।
अगर गुनहगार हूँ, तो बेशक मुझे मौत की सज़ा मिले,
मुझे मंज़ूर है...
मुझे एक भी बर्दाश्त नहीं,
पत्थरों के सामने गिड़गिड़ाना...।
मैं पत्थर की मूरत नहीं,
जो जुल्म को देख मौन रहूँ...।
आशिकी देखना मेरा तो—
आशिकी तो मेरी कलम तेज़ करने की धार है।
हाँ, हाँ, मैं आख़िरी बार बोल रहा हूँ—
मुझे ईश्वर-अल्लाह का जुल्म बर्दाश्त नहीं।
— एस.टी.डी. मौर्य ✍️