कभी-कभी अपनेपन में भी, परायापन नज़र आता है,
कभी-कभी साथ के साथ भी, सब बिखर जाता है!
नहीं मालूम क्यों...?
हाथ पकड़ना भी कभी-कभी घुटन महसूस कराता है,
कभी-कभी अपनों के साथ बैठे रहना भी,
दम घुटा जाता है!
वो अपने हैं मेरे, वो घर है मेरा,
वो साथ हैं मेरे, वो स्वर्ग है मेरा...
फिर भी न जाने क्यों, कभी-कभी
यहाँ से भाग जाने को जी चाहता है!
कभी-कभी पराएपन में भी,
जीते रहने को जी चाहता है।
कुछ शब्द जो गहरे घाव की तरह लगते हैं तन पे,
उन्हें मिटा सके...
ऐसा कोई रास्ता नज़र नहीं आता है!
कभी-कभी उनकी ज़ुबान से कुछ ऐसा निकल जाता है,
जो मुझे उनका न होने का एहसास करवाता है...
वो अच्छे हैं बहुत, ख़्याल रखते हैं मेरा,
मेरी मौजूदगी में खुश हैं... वो सब दिखता है,
मगर फिर भी ना जाने क्यों?
कभी-कभी...
ये सब ना देखने का जी चाहता है!
कभी-कभी अपनों के साथ भी,
पराए होने का एहसास आ जाता है...
कभी-कभी अपने आप में ही,
अंदर ही अंदर एक एहसास मर जाता है!
किसी की कुछ हरकत करने भर से ही,
कभी-कभी दिल टूट सा जाता है...
फिर भी खुद को समझाते हैं— "सब ठीक है",
पर फिर भी ना जाने क्यों?
कभी-कभी...
ये मन समझना नहीं चाहता है!
कभी-कभी अपनों के साथ भी,
एक खामोशी का सफ़र आ जाता हैं...
कभी कभी अपनेपन में भी पराया होना नजर आ जाता हैं!!!!