जिंदगी में भावनाएं वहां इन्वेस्टमेंट करनी चाहिए,
जहां हमें कोई पसंद है।
यह थोड़ा एक नजरिए से गलत है,
उससे बेहतर यह है कि 'भावनात्मक इन्वेस्टमेंट' वहां करना चाहिए जहां सामनेवाले इंसान भी हम से लगाव हो।
कोई व्यक्ति हमें अच्छा लगता है और हम उस पर सब न्योछावर कर दे या उसे ही सबकुछ समझने लगे तो यह सब व्यर्थ है।
क्यूं व्यर्थ है?
क्यूंकि क्या वह व्यक्ति हमे पसंद करता है?
हमारी कद्र करता है ?
हमारी भावनाएं समझता है?
जो इन प्रश्नों का उत्तर हां मिले तो हम सही राह पर है।
नहीं तो फिर हमारी 'भावनाओं का मूल्य' कुछ भी रहेगा नहीं।
हमें समझना उसी को चाहिए जो हमें "समझता हो" नहीं की 'हमें बार-बार समझा जाता' हो।