हम साथ नहीं हैं तो क्या है ग़म,
कभी-कभी मिलते हैं, वो भी क्या है कम।
जी लेंगे वही पुरानी यादों के संग,
आज तन्हा सी ख़ामोशी में भी हम रहें बेफ़िक्र रंग।
दूरी में भी एक अपनापन रहता है,
ख़ामोश रहकर भी दिल सब कहता है।
और जब मिलेंगे, बनाएँगे नई यादें,
बिना किसी शिकायत के, बिना किसी फ़रियादें।
जितना मिलना हुआ, वही तो काफ़ी है,
हर एक लम्हा आज भी क़ीमती है।
हम साथ नहीं हैं तो क्या है ग़म,
कभी-कभी मिलते हैं, वो भी क्या है कम।