अब्ज ज्यू बजता
है नभ मे
अधर धरा का
लगता सिन्दूरी
खग की उत्पत्ति से
नभ मे बहती अचल
समीर जिसके उत्तर
से अब्धि की धरा
लेती मधु हिलोर
खग खग की चीत्कार
से उत्पन्न राग से
गता कण कण
अमृत गीतक
उत्सर्ग धरा का
गाती सारंग
ज्यो ज्यो अर्क ताप
बरसाता दहकती
भू माँ की सुगंध से
भर जाता
ज्यो ज्यो अर्क ताप बरसाता
आशीष जैन (श्रीचंद जी)