उसकी आँखों में खौफ
-सा बिखरा पड़ा है
उसके हाथो में खिलोने
है बच्चो के पर
पसीना कहानी कहता है
के किसी के जाने का
उसके कांपते होठो
पर एक अजीब सी
दहशत है इस बेकार
की महंगाई ने तोड़ दी
है उसकी कमर बेटा
तो अब रहा नहीं
उपर से सता रही
चिंता बेटी के जाने की
वो पड़ी हुई है अस्पताल
में दवा का खर्चा नहीं
है देने को लगता है
ये जेसे अभी देगा रो
बेचता है खुशियाँ बच्चो
को पर खुद की खुशी न
जुटा पाया शाम को घर
लौटा वापस तो देखा
बेटा रहा नहीं अब घर में
बेटी को भी न ये बचा पाया
आशीष जैन (श्रीचंद)