अंदर तबाही मचा देते हैं
वे जज़्बात…
जिन्हें हम किसी के नाम से जोड़ देते हैं।
जब प्रेम अधूरा रह जाता है,
तो वह खत्म नहीं होता…
वह और गहरा हो जाता है।
अकेले कमरे की खामोशी में
वही चेहरा दीवारों पर उभरता है,
वही आवाज़ कानों में गूंजती है,
और दिल पूछता है —
“क्यों नहीं मिला मुझे पूरा?”
लेकिन सुनो…
प्रेम कभी अधूरा नहीं होता,
अधूरी होती है हमारी चाह —
किसी को पाने की,
किसी पर अधिकार की।
जिसे तुम विरह समझती हो,
वह भी प्रेम का ही दूसरा रूप है।
मिलन में प्रेम बाहर बहता है,
विरह में प्रेम भीतर उतरता है।
अकेलापन शत्रु नहीं है,
वह तुम्हें तुम्हारे पास लाने आया है।
तुम जिसे खोने से डरती हो,
वह तो पहले ही तुम्हारे भीतर बस चुका है।
वह तुम्हारी सुगंध बन जाएगा। 🌸