क्यों हमें महिला दिवस और पुरुष दिवस मनाना पड़ता है?
क्या हम सिर्फ मानव दिवस नहीं मना सकते?
एक तरफ हम बराबरी की बात तो करते हैं,
लेकिन फिर किसी एक जात या वर्ग के नाम पर दिन क्यों मनाते हैं?
अगर सच में बराबरी चाहिए,
तो शायद हमें सबसे पहले खुद को सिर्फ इंसान मानना सीखना होगा।