मैं और मेरे अह्सास
हो कौन बता दो
हो कौन बता दो एक बार तो बताना पड़ता हैं l
है ग़र इश्क़ तो बारहा बोलके जताना पड़ता हैं ll
मासूमियत और नजाकत को बरकरार रखके l
अंदर ओ बाहिर से खुद को सजना पड़ता हैं ll
यू खामोशी से इज़हार ए मोहब्बत नहीं होती l
तकाजा ये रश्में मोहब्बत का निभाना पड़ता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह