ॐ नमः शिवाय
अबूझ मुहूर्त का पाखण्ड
आजकल एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है कि लोग अपने विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत या अन्य शुभ कार्यों के लिए ज्योतिषीय मुहूर्त पूछने के बजाय कुछ पर्वों और त्योहारों को ही “अबूझ मुहूर्त” मानकर उसी दिन कार्य सम्पन्न कर लेते हैं। यह प्रवृत्ति शास्त्रीय परंपरा की दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती।
वास्तव में मुहूर्त शास्त्र अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक प्रणाली है, जिसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहस्थिति, लग्न आदि अनेक तत्वों का विचार करके ही किसी कार्य के लिए अनुकूल समय निर्धारित किया जाता है। यदि इन सभी सिद्धान्तों की उपेक्षा करके केवल किसी पर्व को ही स्वतः शुभ मान लिया जाए, तो यह मुहूर्त शास्त्र की मूल भावना के विरुद्ध है।
१. चैत्र नवरात्रि
बहुत से लोग मानते हैं कि चैत्र नवरात्रि में सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। परंतु इस समय प्रायः सूर्य मीन राशि में होते हैं और यह काल मीन संक्रांति अथवा खरमास के अंतर्गत आता है। शास्त्रों में इस अवधि में विवाह आदि मांगलिक कार्य सामान्यतः वर्जित बताए गए हैं।
२. गणेश चतुर्थी
भगवान गणेश की उपासना का यह अत्यंत पवित्र पर्व है, परंतु ज्योतिष की दृष्टि से चतुर्थी तिथि ‘रिक्ता तिथि’ मानी गई है, जो मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं कही जाती।
३. रामनवमी
रामनवमी भगवान श्रीराम के प्राकट्य का महापर्व है। परंतु ज्योतिषीय मतानुसार नवमी भी रिक्ता तिथि मानी जाती है, इसलिए विवाह या गृहप्रवेश जैसे कार्यों के लिए इसे सामान्यतः उपयुक्त नहीं माना जाता।
४. महाशिवरात्रि
यह शिवभक्तों के लिए महान साधना का पर्व है, किंतु यह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आता है, जिसे अधिकांश मांगलिक कार्यों में अनुकूल नहीं माना गया है।
५. विजयादशमी
दशहरा अत्यंत शुभ और विजयोत्सव का दिन माना जाता है। इस दिन शस्त्रपूजन, शिक्षा आरम्भ या नया कार्य प्रारम्भ करना श्रेष्ठ माना गया है, परंतु अनेक परंपराओं में चातुर्मास के दौरान विवाह आदि संस्कारों को वर्जित बताया गया है।
६. दीपावली
दीपावली लक्ष्मीपूजन और आध्यात्मिक उत्सव का महान पर्व है, परंतु यह अमावस्या तिथि को आता है, जो सामान्यतः मांगलिक संस्कारों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।
इस प्रकार स्पष्ट है कि अधिकांश व्रत-पर्वों का उद्देश्य भगवान का स्मरण, उपासना और आध्यात्मिक साधना है, न कि विवाह या अन्य सांसारिक कार्यों का आयोजन।
यदि केवल सुविधा या भीड़ के कारण इन पर्वों को “अबूझ मुहूर्त” घोषित कर दिया जाए, तो यह शास्त्रीय मुहूर्त विचार की परंपरा को कमजोर करता है। अतः उचित यही है कि किसी भी मांगलिक कार्य के लिए शास्त्रसम्मत मुहूर्त का विचार करके ही कार्य किया जाए।
आपका अपना
आचार्य दीपक सिक्का
संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी