मैं और मेरे अह्सास
नज़ारा
सुबह से लेकर रात हो गई याद करते करते l
बेहोश हो गये दर्द भरे नग़में सुनते सुनते ll
जग में परिवर्तन ही संसार का नियम है कि l
नजरिया और नज़ारा बदला चलते चलते ll
मौसम की रवानी ने कुछ इस तरह बहकाया l
चांद सितारे सो गये मेरे साथ थकते थकते ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह