मैं और मेरे अह्सास
सुकून के पल
यादें सुकून के पल में आकर सता जाती हैं l
इस तरह से यादें कौन सा सुकून पाती हैं ll
ना सुबह देखती है ना रात देखती है बस l
वो बिना इत्तला किये कभी भी आती हैं ll
सुहाने और नशीले लम्हें को दोहराकर l
निगाहों में अश्क़ों की बरसात लाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह