क्या भारत में पहले की तुलना में सांप्रदायिक तनाव ज्यादा बढ़ गए हैं और इसके क्या कारण हैं?
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पेड मीडिया के प्रायोजक यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार कम्पनियों के मालिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर को ट्रिगर करना चाहते है, ताकि निम्नलिखित लक्ष्य पूरे किये जा सके :
हिन्दुओ को ईरान में भारतीय सेना भेजने के लिए तैयार करना
भारतीय मुस्लिमों को एक बार फिर अलग देश की मांग करने के लिए तैयार करना
भारत में बड़े पैमाने पर कन्वर्जन करना
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक उपरोक्त लक्ष्यों की पूर्ती के लिए पेड मीडिया पार्टियो, पेड मीडिया नेताओं, पेड बुद्धिजीवियों, पेड बॉलीवुड कलाकारों, पेड साहित्यकारों एवं पेड मीडिया कर्मियों का इस्तेमाल कर रहे है। निचे मैंने बताया है कि पेड मीडिया के प्रायोजक ऐसा कैसे कर रहे है, और किन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है।
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[टिप्पणी : इस जवाब में 2 खंड है पहला खंड राजनैतिक घटनाओं एवं उनके आकलन पर निकाले गए निष्कर्ष पर आधारित है। दुसरे शब्दों में, खंड (अ ) में मेरे पूर्वाग्रहो, अनुभवो, अनुमानों एवं मेरी राय आदि का घालमेल है। खंड (ब ) औचित्यपूर्ण समाधान के बारे में बताता है।]
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खंड : अ
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(1) भारत में आजादी से पहले हिन्दू-मुस्लिम तनाव :
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ब्रिटिश के आने से पहले भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच सामुदायिक स्तर पर तनाव काफी कम था। औरंगजेब के प्रारम्भिक काल में यह तनाव बढ़ा, लेकिन औरंगजेब के बाद तनाव फिर से कम हो गया था।
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प्रत्येक समाज में भाषा, क्षेत्र, परम्पराएं, नस्ल, जाति, धर्म आदि के आधार पर कई छोटी मोटी दरारे होती है। जैसे जैसे दरारे चौड़ी होगी आपसी संघर्ष एवं अलगाव बढ़ता जाएगा। गोरो ने भारतीय समाज में जितनी भी दरारें थी, उन्हें चिन्हित किया और फिर इन दरारो को चौड़ा एवं गहरा करने के लिए गेजेट में क़ानून छापने शुरू किये। इसी में से एक दरार हिन्दू-मुस्लिम तनाव था। इसके लिए उन्होंने गाय, मुस्लिम प्रतिनिधित्व, एवं पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित नेताओं आदि का इस्तेमाल किया।
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जिन्ना मुसलमानों का नेता नहीं था, और मुस्लिम उसे अपने पास भी नहीं बैठाते थे। गोरो ने पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उसे मुस्लिम नेता के तौर पर स्थापित किया। उसका काम मुस्लिमों को अलग देश की मांग करने के लिए तैयार करना था।
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संतुलन बनाने के लिए यही काम उस समय गोरो द्वारा समर्थित कट्टर हिन्दू नेता भी कर रहे थे। 25 साल तक चली एक्सरसाइज के बाद गोरे भारतीय उपमहाद्वीप को 3 हिस्सों में विभाजित करने में सफल रहे। जब गोरे भारत से गए तो यह सुनिश्चित करके गए थे जवाहर लाल जनसँख्या नियंत्रण का क़ानून नहीं छापेंगे, ताकि धार्मिक जनसँख्या का अनुपात असंतुलित हो सके।
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(2) 1989 से साम्प्रदायिक राजनीती फिर से शुरू हुई :
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1947 से 1985 तक हिन्दू-मुस्लिम तनाव में मामूली घटत-बढ़त के बावजूद यह मुद्दा राजनीती से दूर रहा। लेकिन 1988 से जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको ने भारत को टेकओवर करना शुरू किया तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उन्होंने इसमें फिर से इंधन डालना शुरू किया।
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अफगान-सोवियत वॉर के दौरान अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक पाकिस्तान के साथ मिलकर इस्लामिस्ट कट्टरपंथीयों को सोवियत रूस के खिलाफ बेकिंग दे रहे थे। 89 में वॉर ख़त्म होने के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों की कुछ तंजीमो को कश्मीर में रोजगार दे दिया गया।
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सोवियत के उखड़ने से भारत में दूसरा ध्रुव ख़त्म हो गया था, अत: भारत के भी ज्यादातर नेताओं एवं पार्टियों ने अपने आप को टिकाए रखने और बढ़ाने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को जॉइन कर लिया था। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने जब भारत में घुसना शुरू किया तो धार्मिक एजेंडे के तौर पर उन्हें भारत में हिन्दू-मुस्लिम अलगाव खड़ा करना था। इसके लिए उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाना शुरू किया, जो इसमें ईंधन डाल सके।
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(2.1) कश्मीरी पंडितो का पलायन : कश्मीर में आजादी की तहरीक पहले से ही चल रही थी, लेकिन इस पर इस्लामिक कट्टरपंथियों का कब्ज़ा नहीं था। 1987 में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं पकिस्तान की बेकिंग से इस मूवमेंट को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हाईजेक कर लिया था। यह बात खुली हुयी थी कि हथियारबंद दस्तो द्वारा कश्मीरी पंडितो पर बड़े पैमाने पर हिंसक हमला होना तय है। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के निर्देश पर केंद्र सरकार ने ये सब कुछ होने दिया और जानबूझकर मिलिट्री नहीं भेजी।
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इस समय केंद्र सरकार बीजेपी=संघ के समर्थन से चल रही थी। लेकिन न तो बीजेपी=संघ ने मिलिट्री भेजने की मांग रखी, और न ही कश्मीरी पंडितो के पलायन के बाद उन्होंने सरकार से अपना समर्थन वापिस लिया !! (?)
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कश्मीरी पंडितो के पलायन ने पूरे देश को हिला दिया था। बीजेपी=संघ के नेताओं ने इस घटना का पूरे देश में व्यापक प्रचार किया ताकि पार्टी का विस्तार किया जा सके। और उन्होंने विस्तार किया भी। मैंने खुद भी संघ उन्ही दिनों जॉइन किया था और संघ की सभाओं में 1998 तक इस घटना को काफी हौलनाक तरीके से डिसकस किया जाता था।
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(2.2) बांग्लादेशी घुसपैठ : 89 से सऊदी अरब के धनिकों ने बांग्लादेशीयों को असम में घुसने के लिए फाइनेंस करना शुरू किया। पहली आवक 71 के युद्ध में हुयी थी। 86 से फिर आवक शुरू हुयी और 90 से इसमें निरंतरता आने लगी। आई बी रिपोर्ट के अनुसार 2001 तक देश में 1.5 करोड़ अवैध बांग्लादेशी आ चुके थे।
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(2.3) विवादित ढांचे को गिराना : 90 से 92 तक मंदिर आन्दोलन चला। यहाँ शुरू से ही यह लक्ष्य था कि ढाँचे=मस्जिद को गिराना है, ताकि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इसे उछाला जा सके। बीजेपी=संघ के नेताओं ने मस्जिद गिराने की प्लानिंग की और कोंग्रेस एवं अन्य पेड मीडिया पार्टियों ने इसके लिए रास्ता तैयार किया।
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बीजेपी=संघ से लेकर केंद्र सरकार और सभी नेताओं को 6 महीने पहले से पता था कि एक सामूहिक भीड़ द्वारा ढाँचे=मस्जिद को गिराया जाएगा। वाजपेयी ने इसे अपनी सार्वजनिक सभाओं में इशारतन व्यक्त किया था।
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वाजपेयी का एक वीडियो यह देखिये – https://www.youtube.com/watch?v=-EhMmJEwbTg
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राव के पास कई सारे विकल्प थे जिनका इस्तेमाल करके वे शांतिपूर्ण तरीके से ढाँचे को गिराए जाने से रोक सकते थे। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा उन्हें हस्तक्षेप न करने के निर्देश थे, अत: उन्होंने ठीक उसी तरह से टाइम पास किया, जैसे कश्मीरी पंडितो के समय वीपी सिंह सरकार ने किया था !! जिस दिन ढांचा गिराया गया उस दिन CRPF की टुकड़ी कुछ ही दूरी पर मौजूद थी और प्रधानमंत्री कार्यालय को लगातार मेसेज भेजे जा रहे थे, लेकिन उन्हें हर बार “इंतजार करने” के आदेश दिए गए।
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Replug: How PM P.V. Narasimha Rao picked up the pieces after Babri demolition
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As kar sevaks milled into Ayodhya and mocked at the massed but immobilised Central troops in Faizabad next door, half a dozen leftist MPs drove up to the Prime Minister's office in Delhi. In the gathering dusk, they made a last-minute appeal to P.V. Narasimha Rao to take control of Ayodhya because they suspected the real intentions of the sangh parivar. "Avert a disaster," pleaded the CPI(M)'s Somnath Chatterjee.The glum-visaged head of government listened patiently and explained what he had done and also the assurances the Kalyan Singh government gave the Supreme Court.
The Sanskrit scholar narrated a sloka, which the delegation did not comprehend. For their benefit he translated: "For doing any work, seven steps have to be taken. One takes the first six steps and leaves the seventh to God. I have taken the six steps." Next day, the insensitive God to whom Rao left the seventh step did not oblige the devout believer in karma.
जैसे ही कारसेवकों ने अयोध्या में घुसना शुरू किया तो कुछ ही दूरी पर सैन्य टुकड़ी मौजूद थी। आधा दर्जन कम्युनिस्ट सांसद प्रधानमंत्री के पास पहुंचे और उन्होंने आशंका व्यक्त की कि अनहोनी होने वाली है। राव ने धैर्य से उनकी बात सुनी और फिर उन्हें संस्कृत का एक श्लोक सुनाया।
चूंकि सांसद इसका अर्थ नहीं समझ सके इसीलिए संस्कृत के विद्वान पीवी नरसिम्हा राव ने उसका सार समझाते हए कहा कि - किसी भी काम को करने के लिए सात कदम उठाने पड़ते है। आदमी 6 कदम उठाता है, और सातवें को भगवान पर छोड़ देता है। मैंने 6 कदम उठा लिए है !!" और अगले दिन, असंवेदनशील ईश्वर ने वह सातवां कदम उठाया जिसे उठाने का दायित्व राव ने कर्म में विश्वास करने वालो पर छोड़ दिया था।
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रिटायर होने के बाद एक साक्षात्कार में यह पूछे जाने पर कि, क्या वे मानते है कि उनके अनिर्णय की वजह से बाबरी मस्जिद गिरायी गयी, राव ने जवाब दिया था कि – फैसला न लेना भी एक फैसला होता है !!
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7 दिसम्बर को अन्तराष्ट्रीय मीडिया एवं अंग्रेजी अखबारों में “बाबरी मस्जिद गिरायी गयी” रिपोर्ट किया गया था, जबकि ज्यादातर हिन्दी अखबारों ने “विवादित ढांचा ध्वस्त” नाम से हेडलाइन बनायी थी। मैंने उस समय हिन्दी के जो भी अख़बार पढ़े थे उनमे "विवादित ढाँचे" का ही इस्तेमाल किया गया था। किन्तु अंतराष्ट्रीय सनसनी बनाने के लिए अंग्रेजी अखबारों ने मस्जिद रिपोर्ट किया !! इन्डियन एक्सप्रेस ने भी “Disputed Site” का इस्तेमाल किया। लेकिन बाद में इसे सभी जगह पर मस्जिद लिखा जाने लगा।
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न्यूयार्क टाइम्स ने खबर लगाईं – हिन्दू उग्रवादियों ने मस्जिद गिरायी
Hindu Militants Destroy Mosque, Setting Off a New Crisis in India
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The Hindu - Babri Masjid destroyed
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Times of India - Kar sevaks destroy Babri Masjid
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Hindustan Times - Babri Masjid demolished
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Indian Express - Disputed structure pulled down
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इस तरह की घटनाएँ सिर्फ तब अंजाम दी जा सकती है, जब अदालतें आपके हाथ में हो। भारत की अदालतें 47 से ही ब्रिटिश धनिकों के नियंत्रण में थी, लेकिन 91 में कॉल्जियम लाकर उन्होंने अदालतों को अपनी फौलादी पकड़ में ले लिया था। वस्तुत: इस आयोजन के किसी भी शिल्पकार को सजा नहीं हुयी। वाजपेयी को तो आरोपी तक नहीं बनाया गया।
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ढांचा=मस्जिद ध्वस्त होने के बाद ISI ने दाउद को धमाके करने के लिए आवश्यक सहयोग दिया, और मुंबई में धमाके हुए। ( ISI अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ जाकर दाउद को सहयोग नहीं कर सकता था )
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वाजपेयी जनसँख्या नियंत्रण एवं बंगलादेशियो को निष्कासित करने का वादा करके सत्ता में आये थे। 1999 से 2004 तक वाजपेयी ने सरकार चलायी लेकिन उन्होंने ये 2 क़ानून गेजेट में नहीं छापे, और न ही इनका ड्राफ्ट सामने रखा !!
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2002 के गुजरात दंगो में मोदी साहेब की कोई नकारत्मक भूमिका नहीं थी। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया के माध्यम से उन्हें “हीरो” बना दिया। मतलब इस बात को स्थापित किया गया कि दंगो के दौरान मोदी ने मुस्लिम विरोधी फैसले लिए थे !! (जो कि एक गलत आरोप था, एवं पेड मीडिया द्वारा उनकी छवि चमकाने के लिए बनाया गया था।)
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2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह जी ने सरकार चलायी और उन्हें यह निर्देश थे कि, वे जनसँख्या नियंत्रण एवं बांग्लादेशियों को निष्कासित करने का क़ानून नहीं छापेंगे। अत: उन्होंने भी साइलेंटली 10 साल निकाल दिए ताकि समस्या पनपती रहे।
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पेड मीडिया का समर्थन मिलने से 2014 में मोदी साहेब पीएम बने और फिर उन्होंने उपरोक्त 2 कानूनों को टालने के लिए 6 साल का टाइम पास किया। टाइम पास के अलावा उन्होंने भारत में सम्पूर्ण ध्रुवीकरण की प्रक्रिया भी शुरू की ताकि हिंसा की जमीन बनायी जा सके।
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आज आप साफ़ तौर पर देख सकते है कि पूरे देश को पेड मीडिया के प्रायोजक 2 खेमो में बाँट चुके है। वो भी खुले तौर पर। एक झुण्ड में छद्म हिंदूवादी एवं छद्म राष्ट्रवादी है, दुसरे झुण्ड में छद्म सेकुलर, कथित टुकड़े टुकड़े गैंग, कथित अर्बन नक्सल, कथित वामपंथी आदि। और सभी "खुले तौर" पर खेमे खड़े करने का काम कर रहे है।
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(3) कैसे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम गृह युद्ध शुरू कर सकते है ?
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वे उसी ट्रेक का इस्तेमाल कर रहे है जिस ट्रेक का इस्तेमाल उन्होंने 47 में और 90 में कश्मीर पंडितो के निष्कासन में किया था। उनकी योजना दिए गये चरणों में काम कर रही है –
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(3.1) पहले पेड मीडिया पार्टियों एवं नेताओं का इस्तेमाल करके वे तनाव भड़काएंगे
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(3.2) फिर पेड मीडिया पार्टियों एवं पेड मीडिया नेताओं का इस्तेमाल करके दंगे करवाएंगे
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(3.3) फिर आई टी सेल का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया पर भड़काऊ एवं फेक न्यूज फैलायेंगे
इन सभी मामलो में न तो पुलिस कार्यवाही करेगी, न ही जज किसी को दंड देगा। उलटे पेड मीडिया एवं सोशल मीडिया पर उकसाने वाले इन लोगो को कवरेज दिया जाएगा, ताकि इससे ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुँचाया जा सके। यदि पुलिस एवं अदालतें सुधार दी गयी तो यह तीनो चरण रूक जायेंगे। अत: ये सब होता रहे इसके लिए वे पुलिस एवं अदालतें सुधारने का कानून नहीं छापेंगे।
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(3.4) 2 करोड़ अवैध बंगलादेशीयों को देश में बनाये रखना, और कथित NRC की चाबी देकर हड़काना ताकि उन्हें हथियार उठाने के लिए तैयार किया जा सके।
यह एक वास्तविक वजह है, जो भारत में हिन्दू-मुस्लिम गृह युद्ध को शुरू कर सकती है। अभी जो CAA को NRC से मिक्स करने का ड्रामा हुआ है उसका एक बड़ा उद्देश्य यह था कि असम NRC से बाहर रह गए अवैध बंगलादेशीयों को हथियार पकड़ने के लिए तैयार किया जा सके। इसीलिए असम के NRC में यह प्रावधान नहीं रखा गया कि जो अवैध बंगलादेशी NRC से बाहर रह जायेंगे, उन्हें भारत से कैसे निष्कासित किया जायेगा। तो NRC एवं CAA ने इन्हें भारत से निष्कासित नहीं किया है। दुसरे शब्दों में सरकार ने भारत के अंदर हथियार पकड़ने वालो की एक फ़ौज तैयार कर ली है।
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(3.5) साम्प्रदायिक तनाव की इन सभी घटनाओं को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह रिपोर्ट किया जायेगा, जिससे यह स्थापित किया जा सके कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव लगातार बढ़ रहा है, और भारत में हिन्दू-मुस्लिम साथ नहीं रह सकते।
वे पिछले 2-3 साल में इतना बारूद बिछा चुके है कि अब यदि वे असम में इस्लामिक कट्टरपंथियों को हथियार ( AK-47, ग्रेनेड आदि ) भेजना शुरु करे तो असम में बड़े पैमाने पर कत्ले आम होने लगेगा, और लाखो हिन्दू उसी तरह भारत की और पलायन करेंगे जैसे कश्मीरी पंडितो ने किया था। इस दौरान हजारो लोगो की जाने जा सकती है। इसके बाद वे भारत के अन्य राज्यों में भी हथियार भेजना शुरू करेंगे और पूरा देश चपेट में आ जाएगा। एक बार यह सब शुरू होने के बाद यह कई सालों तक रुकने वाला नहीं है। वे अलग अलग गुटों को हथियार भेजते रहेंगे और पेड मीडिया का इस्तेमाल करके दंगा भड़काते रहेंगे।
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(4) क्या मोदी साहेब, आडवानी या योगी जी हिन्दू-मुस्लिम तनाव के लिए जिम्मेदार है ?
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दरअसल, भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाने का मसला अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के वैश्विक राजनैतिक लक्ष्यों एवं अपने कारोबारी हितो से जुड़ा हुआ है। पेड मीडिया के प्रायोजको की शक्ति का मूल स्त्रोत ऐसे निर्णायक हथियार है, जिन पर भारत की सेना बुरी तरह से निर्भर करती है। न्यायपालिका से लेकर सभी मुख्य संस्थाओं एवं प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, सोशल मीडिया तक में उनका अब निर्णायक दखल है। इसके अलावा सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं नेता अपने को टिकाये रखने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर बुरी तरह से निर्भर करते है।
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संघ=बीजेपी के नेता यदि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के एजेंडे से बाहर जायेंगे तो वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उन्हें रिप्लेस कर देंगे। यह सब कुछ इस तरह से चलता है कि सभी पेड मीडिया पार्टियों एवं नेताओं में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का सहयोग लेने का एक तरह का कम्पीटीशन शुरू हो जाता है। जो नेता उनके एजेंडे को अच्छे तरीके से आगे धकेलेगा उसका मीडिया कवरेज बढ़ता जाएगा।
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संघ 1925 से ही काम कर रहा है और उन्होंने 1951 में ही अपनी पार्टी का गठन कर लिया था। लेकिन संघ=बीजेपी को जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया का सपोर्ट देना शुरू किया सिर्फ तब उन्होंने तेजी से विस्तार करना शुरू किया। और वे नेता आगे निकल गए जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ा रहे थे।
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यदि आडवाणी रथयात्रा नहीं निकालते तो वे मुरली मनोहर जी जोशी का कवरेज बढ़ा देते, और तब जोशी जी रथ यात्रा निकाल कर हीरो बन जाते। यदि मोदी साहेब गुजरात में अपने जेस्चर एंटी-मुस्लिम नहीं बनाकर रखते तो वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके तोगड़िया जी / या संजीव जी जोशी से उन्हें रिप्लेस कर देते।
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और आज भी यदि मोदी साहेब तनाव को भड़काने में कमतर प्रदर्शन करने लगते है तो अमित शाह एवं योगी का कवरेज बढ़ता जाएगा, और हिंदूवादी कार्यकर्ताओ को यह शुबहा होने लगेगा कि पीएम तो अमित शाह या योगी जैसे आदमी को होना चाहिए। और इसी तरह यदि औवेसी बंधू अपने बयानों में इंधन नहीं डालेंगे तो टीवी पर उनके इंटरव्यू आने बंद हो जायेंगे।
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मतलब, 1990 के बाद से सभी पेड मीडिया पार्टियों के नेताओं के कद वगेरह को सबसे ज्यादा पेड मीडिया के प्रायोजक प्रभावित करते है। नेताओ की स्थिति टायरो की तरह है, और पेड मीडिया हवा भरने वाला पम्प है। पेड मीडिया प्रायोजको द्वारा लांच की गयी आम आदमी पार्टी इसका एक बढ़िया उदाहरण है।
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मेरा बिंदु यह है कि, मोदी साहेब, अमित शाह, योगी जी, ओवेसी, वारिस पठान, ममता, मुलायम आदि निर्णायक रूप से भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने के लिए जिम्मेदार नहीं है। वे एक तरह से WWE के पहलवान है जो अपना पार्ट अदा कर रहे है।
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यदि उन्हें रिंग में रहना है तो रिंग के नियमों का पालन करना होता है। टीवी-अख़बार एवं सोशल मीडिया आई टी सेल आदि वो रिंग है जिसके माध्यम से नागरिको को राजनीती दिखायी जाती है। यदि पहलवान नियमों से बाहर जाएगा तो पेड मीडिया के प्रायोजक उसे रिंग से आउट कर देंगे, और नया पहलवान उतार देंगे !!
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कुछ उदाहरण जिनसे आप समझ सकते है कि, पेड मीडिया के प्रायोजक किस तरह से नेताओं का कद बढ़ाने में सहयोग करते है :
मुख्यमंत्री पद : भारत के नागरिक सिर्फ विधायक को चुनते है, किन्तु उनके पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे वे यह बता सके कि किस व्यक्ति को वे मुख्यमंत्री बनाना चाहते है। तो चुनाव होने के बाद पेड मीडिया के प्रायोजक विधायको को खरीद लेते है, और अपने आदमी को मुख्यमंत्री बनवा देते है। चूंकि मुख्यमंत्री के सभी दावेदार जानते है कि पेड मीडिया के प्रायोजको का सहयोग मिलने से उनके सीएम बनने की सम्भावना बढ़ जायेगी
अत: उनमे पेड मीडिया के प्रायोजको को खुश करने की होड़ शुरू हो जाती है। एक उदाहरण आप योगी जी का देख सकते है। यूपी के चुनावी नतीजे आने के बाद मोदी साहेब ने योगी जी को रोकने की काफी कोशिश की थी। वे किसी और को यूपी का सीएम बनाना चाहते थे, ताकि उन्हें आगे कम्पीटीशन की सामना नहीं करना पड़े। किन्तु अंतिम समय पर पेड मीडिया के प्रायोजको ने योगी का समर्थन किया और योगी जी सीएम बने।
मंत्री पद : पेड मीडिया के प्रायोजक विधायको को मीडिया कवरेज देकर उनका कद बढ़ा देते है। जैसे टीवी पर उनके बार बार इंटरव्यू आदि। मीडिया कवरेज बढ़ने से आम विधायक / सांसद का कद शेष विधायको से ज्यादा हो जाता है, और उन्हें मंत्री बना दिया जाता है। मतलब जनता किसी व्यक्ति को सिर्फ विधायक एवं सांसद बना सकती है, किन्तु मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बना सकती। अत: विधायक एवं सांसद चुनाव जीतने के अगले दिन से ही पेड मीडिया के प्रायोजको यानी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने लगते है।
ठीक वैसे ही जैसे गोरो के शासन काल में भारत के देशी राजाओं एवं बुद्धिजीवियों में वायसराय की निगाहों में आने के लिए प्रतिस्पर्धा रहती थी। उदाहरण के लिए, स्मृति जी ईरानी लगातार चुनाव हारती रही, किन्तु चूंकि उन्हें पेड मीडिया लगातार कवरेज दे रहा था अत: उनका कद बढ़ता गया और उन्हें राज्य सभा से भेजकर सीधे मंत्री पद दिए गए। और इसी तरह उन्होंने मनमोहन सिंह को सीधे पीएम के पद पर इंस्टाल किया !!
टिकेट वितरण : भारत की सभी पार्टियों के स्ट्रक्चर ऐसा है कि स्थानीय कार्यकर्ताओ के पास उम्मीदवारों को तय करने के लिए वोटिंग राइट्स नहीं है। इस वजह से विधायक / सांसद टिकेट लेने के लिए पेड मीडिया के प्रायोजको के दफ्तरों में चक्कर लगाते रहते है। उन्हें भय रहता है कि यदि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक नाराज हो गए तो वे आलाकमान से कहकर उनका टिकेट काट देंगे।
प्रधानमंत्री पद : प्रधानमन्त्री जैसे पद पर जाने के लिए पेड मीडिया की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। सिर्फ साल भर में वे किसी मुख्यमंत्री या मंत्री स्तर के नेता में पेड मीडिया के पम्प द्वारा इतनी हवा भर सकते है कि उसका कद पीएम के बराबर हो जाएगा। 2012 तक शिवराज सिंह एवं मोदी साहेब दोनों पीएम की रेस में बराबरी पर थे। किन्तु मोदी साहेब को पेड मीडिया ने बेतहाशा कवरेज देना शुरू किया और सिर्फ 6 महीने में मोदी साहेब के पक्ष में देश व्यापी लहर खड़ी हो गयी। इसी तरह अभी पिछले 1 वर्ष से उन्होंने अमित शाह को विस्फोटक मीडिया कवरेज देना शुरू किया है, जिससे उनका कद प्रधानमंत्री के बराबर हो गया है।
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कृपया इस बात पर ध्यान दें, मेरा बिंदु यह नहीं है कि भारत के नेता वगेरह अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के एजेंट या गुलाम है। दरअसल, पेड मीडिया के प्रायोजक किसी नेता वगेरह को बाध्य नहीं करते कि वे उनके निर्देशों का पालन करें। किन्तु जो नेता उनके एजेंडे के खिलाफ काम करता है, वे उसे मीडिया कवरेज नहीं देते, लेकिन उस नेता को ज्यादा कवरेज देते है जो उनके एजेंडे को आगे बढाने के लिए संजीदगी से काम कर रहा है।
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चूंकि पेड मीडिया के पास भारत का सबसे बड़ा वोट बैंक है, अत: जिन नेताओं को आगे बढ़ना होता है वे पेड मीडिया का सहयोग लेने के लिए खुद ही उनकी तरफ जाना शुरू कर देते है। और बदले में पेड मीडिया द्वारा इस तरह दर्शाया जाता है कि नेताजी कंट्रोल कर रहे है !!
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यहाँ इस बात को समझना जरुरी है कि, इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि किसी नेता या व्यक्ति को नकारत्मक कवरेज दिया जा रहा है या सकारात्मक। असल में जो रिंग के नियमो का पालन नहीं करता उसे रिंग में उतारा ही नहीं जाता है। मतलब पेड मीडिया उनका फोटो तक नहीं दिखाएगा, इंटरव्यू तो बहुत आगे की बात है।
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असल में पेड मीडिया पार्टियों के नेता उकसाऊ बयान इसीलिए दे रहे है क्योंकि उन्हें अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने आश्वस्त किया है कि जज उन्हें सजा नहीं देगा, और वे जो मर्जी सार्वजनिक रूप से बोल सकते है। टीवी चेनलो का इस्तेमाल भी वे इसी तरीके से कर रहे है। जो आदमी तमीज की बात करेगा ये लोग उसे टीवी पर नहीं लायेंगे। ये उस आदमी को टीवी पर लाते है जो इंधन डाले। और नेताओं को भी यह निर्देश दिए गए है कि यदि वे इंधन डालने वाले बयान देंगे तो उन्हें कवरेज दिया जाएगा। तो अब यह एक सिलसिला चल रहा है, जिस पर कोई नियंत्रण नहीं है।
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एक उदाहरण अजमेर शरीफ के सदर दीवान सैयद जेनुल हुसैन चिश्ती का देखिये :
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(a) जब धारा 370 ख़त्म की गयी तो इन्होने इसका समर्थन किया और मोदी-शाह को बधाई भेजी थी - Ajmer Sharif Dargah Dewan Hails Scrapping of Article 370, Congratulates Modi, Amit Shah
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(b) उन्होंने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को केंसल करने के मोदी साहेब के फैसले का भी समर्थन किया और कहा कि ट्रिपल तलाक शरियत के खिलाफ है – Triple talaq against Sharia, Muslims should refrain from eating cow meat: Dewan Ajmer Syed Zainul Abedin Ali Khan - Shafaqna India | Indian Shia News Agency
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(c) उन्होंने मुस्लिमो से अपील की कि उन्हें हिन्दुओ की आस्था का सम्मान करते हुए गौ-मांस खाना छोड़ देना चाहिए। दीवान ने सार्वजनिक सभा में यह शपथ भी ली कि, अब से वे एवं उनका परिवार गौ-मांस का भक्षण नहीं करेंगे - Imam of Ajmer Dargah urges Muslims to give up beef to end ‘communal hatred’ in India
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(d) उन्होंने प्रेस रिलीज जारी की कि, CAA से भारतीय मुस्लिमों को डरने की जरूरत नहीं है, और उन्हें इसका विरोध नहीं करना चाहिए - CAA, NRC not against Muslims: Ajmer dargah dewan | Jaipur News - Times of India
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( ओवेसी ने प्रतिक्रिया दी कि, अजमेर दरगाह का दीवान मुस्लिमो की आवाज नहीं है, और उनके बयान का कोई मतलब नहीं !! उन पर बयान बदलने का दबाव डाला गया और 5 दिन बाद सभी तरफ से प्रेशर बनने पर दरगाह के दीवान को अपना स्टेंड बदल दिया - Dargah Dewan takes U-turn on CAA | Ajmer News - Times of India)
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मैं यहाँ ये रेखांकित कर रहा हूँ कि, चूंकि यह इमाम विष वमन नहीं कर रहा है, और हमेशा तनाव कम करने की बात करता है अत: आपने अब तक टीवी चेनल पर इस आदमी के इंटरव्यू नहीं देखें है।
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यदि ये अपनी लाइन बदल देते है तो आप इन्हें भी पेड मीडिया में देखने लगेंगे, और या जब इन्हें पेड मीडिया कवरेज देने लगेगा तो ये भी अपनी लाइन बदल लेंगे !!
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और इस बात पर ध्यान दें कि पेड रविश कुमार भी पेड मीडिया का अंग है, अत: वे भी ऐसे लोगो को ही टीवी पर लायेंगे जो इसमें इंधन डाल सके। फर्क यह है कि पेड रविश कुमार हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने का काम इतनी सफाई और सौम्यता से करते है कि आपको इसका एहसास नहीं होता।
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और हिन्दू-मुस्लिम में ऐसे सैंकड़ो धार्मिक-राजनैतिक प्रतिनिधि है जो पेड मीडिया के एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा रहे है, अत: आप उन्हें पेड मीडिया में नहीं देखते। इस तरह ज्यादातर नागरिको के पास हमेशा एक तरफ़ा सूचनाए होती है, और तब पेड मीडिया करोड़ो लोगो में यह कॉमन नोलेज बना पाता है कि, भारत के सभी मुसलमान CAA, NRC का विरोध कर रहे है !! और फिर अपने चारो तरफ आप इसी नेरेटिव की जुगाली देखते है !!
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दरअसल वे पेड मीडिया के माध्यम से कुछ 500-700 राजनेताओं, अभिनेताओं, इमामों, धर्म गुरुओ, बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल करके 135 करोड़ के प्रतिनिधित्व का शोशा खड़ा कर देते है। पूरा देश इन्हें देखता है, और पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले लोग इसी लाइन को पकड़ कर सोशल मीडिया पर भी यही सब लिखते है।
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इस तरह पेड मीडिया पर बनाये गए माहौल का रिफ्लेक्शन सोशल मीडिया पर भी आ जाता है। क्योंकि जो लोग सोशल मीडिया पर लिखते-बोलते है वे भी “अपनी राय” बनाने के लिए पेड मीडिया द्वारा दी गयी सूचनाओं पर निर्भर है।
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(4) अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में सिविल वॉर क्यों शुरू करना चाहते है ?
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक ईरान को ख़त्म करने में भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है। यदि आज ईरान एवं अमेरिका में युद्ध होता है तो ऐसी कोई वजह नहीं कि हम अमेरिका को अपनी सैनिक एवं जमीन का इस्तेमाल करने दे। ज्यादातर नागरिक कहेंगे कि हमारी ईरान से कोई दुश्मनी नहीं है, अत: ईरान Vs अमेरिका के युद्ध से हमें कोई लेना देना भी नहीं है।
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किन्तु यदि भारत में हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर शुरू हो जाता है तो अमेरिका भारत को आसानी से युद्ध में घसीट सकता है। वैसी हालत में अमेरिका के फेवर में दो स्थितियां उत्पन्न होगी :
जब भारत में हिन्दू-मुस्लिम वॉर शुरू होगा तो अमेरिका ईरान पर हमला करेगा और तब भारतीय हिन्दू ईरान के खिलाफ अपनी सेना भेजने को तैयार हो जायेंगे। तब अमेरिका भारत का इस्तेमाल करके ईरान+चीन को ख़तम कर सकता है।
गृह युद्ध शुरू होने पर सभी इस्लामिक मुल्क एंटी-इंडिया हो जायेंगे और ज्यादातर सम्भावना है कि इस्लामिक देश भारत पर हमला करें। भारत इस स्थिति से अकेले निपट नहीं सकता। अत: अब अमेरिका भारत को “बचाने” आयेगा। और फिर भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करके पहले इस्लामिक देशो को ख़तम करेगा और फिर भारत का अधिग्रहण कर लेगा।
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2013 में रिकालिस्ट राहुल चिमनभाई मेहता ने अपने एक लेख में यह सम्भावना व्यक्त की थी कि जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो उसके ठीक 6 महीने पहले मोदी साहेब एक के बाद एक एंटी-इस्लामिस्ट क़ानून छापना शुरू करेंगे।
Narendra Modi vs the Dynasty: Contrasting Ideas of India
2013 में लिखे गए पोस्ट का स्क्रीन शॉट :
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हिन्दी अनुवाद :
अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक मोदी साहेब के सामने 3 शर्तें रखेंगे :
बीजेपी में छद्म सेकुलर, एंटी नेशनल, एंटी हिन्दू, एंटी स्वदेशी, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के समर्थक एवं मिशनरीज के समर्थको को टिकेट देना
जब अमेरिका ईरान पर हमला करना तय करे तो हमले के 6 महीने पहले एंटी-इस्लामिस्ट आयटम जैसे – धारा 370, यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (TTT etc), राम जन्म भूमि देवालय आदि को लागू करना, अन्यथा नहीं।
भारत में मिशनरीज को विस्तार करने देना
यदि मोदी साहेब ये शर्ते मान लेते है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक आम आदमी पार्टी के कवरेज में कटौती कर देंगे, वरना नहीं।
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खंड अ का सार : इस खंड में मैंने हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ने का कारण बताया है, जो कि मेरे अनुमान पर आधारित है। किसी अन्य व्यक्ति का अनुमान इस बारे में अलग हो सकता है। मेरा मानना है कि, भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ना अमेरिकी-ब्रिटिश हितों के अनुकूल है। और यदि यह उनके हितो के अनुकूल है तो उनके पास ये वास्तविक ताकत है कि वे भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव घटा बढ़ा सके और अपनी जरूरत के अनुसार भारत के 3–4 टुकड़े कर सके।
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भारत सरकार की ख़ुफ़िया एजेंसिया एवं असम के मुख्यमंत्री 2014 से यह रिपोर्ट कर रहे है कि अल कायदा+आईएसआई असम में अपने कैम्प चला रहे है और पाकिस्तान बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्यो को बंदूक बनाना सिखाने के लिए मदद कर रहा है।
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ISI, Al Qaeda plan to repeat 1990s Kashmir in Assam - The Sunday Guardian Live
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Al Qaeda trying to set up base in Assam: Chief Minister Tarun Gogoi
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मतलब मेरे मानने में यदि वे ऐसा चाहते है तो उनके पास यह करने की क्षमता है, और पेड मीडिया में नजर आने वाला भारत का कोई नेता एवं कोई भी पार्टी उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकती। दरअसल वे उनके हितो की दिशा में ही काम करेंगे !!
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अगले खंड में मैंने समाधान बताया है, जिसका ऊपर दिए गए खंड से कोई लेना देना नहीं है। इस समस्या की वजह जो भी हो निचे दी गयी इबारतें समाधान कर देगी।
मतलब, यदि आपको लगता है कि -
यह सारा तनाव पेड रविश कुमार, वारिस पठान, ओवेसी आदि फैला रहे है तो भी इसका समाधान हो जाएगा, और
यदि आपको लगता है कि मोदी-योगी-शाह इसके लिए जिम्मेदार है, तो भी इस समस्या का समाधान हो जाएगा।
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खंड ब ; समाधान
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(1) कौनसी इबारते गेजेट में छापकर हिन्दू-मुस्लिम तनाव को कम किया जा सकता है ?
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ऊपर मैंने जो भी विवरण दिए है उनमें कुछ तथ्य एवं कुछ मेरी धारणाएं शामिल है। अत: आप इसे खारिज कर सकते है। कारण जो भी रहे हो किन्तु यह एक सच्चाई है कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव लगातार बढ़ रहा है, और यदि इसे रोका नहीं गया तो भारत में हालात हिंसक हो सकते है। निचे मैंने 4 क़ानून बताए है, जिन्हें गेजेट में छापने से हिन्दू-मुस्लिम तनाव को रोका जा सकता है।
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(1.1) जूरी कोर्ट : जजों की भूमिका यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण है। पिछले 30 साल में आप नोटिस करें कि भ्रष्ट जजों ने हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने के लिए उकसाऊ बयान देने वाले कितने नेताओं को सजा दी है — शून्य !! और पिछले 30 साल में हुए किसी भी प्रकार के दंगे में कितने लोगो को सजा हुयी है – लगभग शून्य !!
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इसके अलावा हर आदमी को भी यह छूट दे दी है कि वह जो मर्जी हो वैसे अलगाव वादी, उकसाने वाले, हिंसा भडकाने वाले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल सकता है। तो इधर से भी उन्होंने दड़बा खोल दिया है। मतलब हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे है, सिर्फ एक ट्रिगर से यह विस्फोट होने शुरू हो जायेंगे। और इसमें निर्णायक मोड़ तब आएगा जब वे हथियार भेजना शुरू करेंगे।
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मेरे विचार में अदालतें सुधारने का क़ानून सबसे ज्यादा जरुरी है, और यह क़ानून हमें तत्काल चाहिए। अदालतें सुधारने के लिए मेरे 2 प्रस्ताव है : जूरी कोर्ट की स्थापना और जजों पर वोट वापसी।
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जूरी कोर्ट के गेजेट में आने से अगले दिन ही उकसाने और इंधन डालने के इस पूरे सर्कस का अंत हो जाएगा। यदि हमें हिन्दू-मुस्लिम तनाव को तत्काल कम करना है तो यह सबसे जरुरी क़ानून है। जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून के गेजेट में आने कैसे एकदम से हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ना रुक जाएगा इस बारे में अधिक जानकारी के लिए यह जवाब पढ़ें –
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विशेष आग्रह : जिन लोगो के पास पुलिस एवं अदालतें सुधारने के लिए बेहतर क़ानून है वे कृपया मुझे सूचित करें। यदि उनके प्रस्ताव बेहतर हुए तो मैं उनके प्रस्तावों का समर्थन