*नव संवत्सर*
सावन बीता भादौ बीता, बीती रातें मावठ की,
कण- कण में मस्ती छाई ,चली हवा बहारों की ||
उषा की लालिमा बनकर,आई भोर मतवाली,
पंथी अपनी राहें भूले, फुल खिले हैं डाली -डाली ||
शान्त सरोवर लहरें शीतल,चहुँदिशि सुगंध बढ़ाए।
साँझ ढली हंसों का जोड़ा, खुशियों की सौगात बढ़ाए ||
नहीं यहाँ घर-बार मेरा, न चाहत मेरी, हजारों की बुनियाद है |
धरती पर लाया नव जीवन, किसने की फरियाद है ||
देख चुका मन कितने पतझर, अब छाई हरियाली है |
मस्त मगन पौधे लहराये, जैसे बजी कहीं शहनाई है ||
मधुर - मधुर भौरों का गुंजन,खिला -खिला आकाश।
इन्द्रधनुष सा नभ पर छाया, माधव बना प्रकाश।।
फूलों की माला लेकर,चाँद आया धरती पर |
उड़ते पंखेरू पनघट देखे,बादल या अंबर पर||
फूलों की दुनिया मे , झूमें पंछी कोयल गाये।
सूरज की किरणे भी, हँसती धरा नहलाये।।
टिमटिमाते ख़ुशी से तारे,रिमझिम-रिमझिम बूंदें आई |
पेड़ों के पत्तों ने मिलकर झूम-झूमकर तालियांँ बजाईं ||
महक उठी चहके चिड़िया, भंवरे मतवाले मंडरा रहे हैं।
फूलों से है सजी क्यारियाँ, मधुरस पीने को आ रहे हैं।
*राकेश कुमार पंवार*