अरसे बाद आया तो सही
मगर!!
शिकायत की पोटली खोली
न जाने कितनी रार लिए
पीड़ा की दरकार लिए
खुद को कहता सुना न कभी
कहता सुनता है हरपल ही
अपराधी तेरी एक नहीं
औरों की भी हिस्सेदारी
उसपर खुद की भी सगी नहीं
अपराधबोध की आदी हूँ
पूरी न आधी-आधी हूँ
आधे में भी टुकड़े -टुकड़े
बिखरे हैं सब एक सार नही......
ख्वाहिश का तो कुछ पता नहीं
है न है यह इन्कार नहीं, अच्छेपन
का कुछ भार नहीं...
सुख के साथी तेरे कितने
दु:ख का कारण मैं एक रही
धीरे - धीरे समझा जो अब
समझा तो था स्वीकार नही
जाने मुझमें था क्या देखा
जो था लेकिन अब रहा नहीं
मैंने तुझको ही सच माना तुझमें
ही खुद को पहचाना अन्तर ने कहा
बस वहीं किया.....;;;;
#गफलत #पहचान#अन्तर