हां मैं जीने लगी हूं
कविता
थोड़ा-थोड़ा आज कल मैं जीने लगी हूं
थोड़ा-थोड़ा खुद को बचाने लगी हूं
मुझे परवाह नहीं दुनिया के लोगों की
अब मैं खुलकर मुस्कुराने लगी हूं
जो चाहे मन में वही करने लगी हूं
पागलपन मस्ती अब सब मुझ में आने लगी है
जिद होनेका जज्बा है जोश भरी जवानी है
आंखों में उत्साह है दिल में नादानी है
और थोड़ी-थोड़ी समझदारी भी आने लगी है
खुलकर जीना जिंदगी है
अपनी लिखनी मुझे एक नई कहानी है
अब मुझे में मेरे लिए ही दीवानगी है
थोड़ा-थोड़ा खुद से प्यार करने लगी हूं
थोड़ा-थोड़ा खुद पर मरने लगी हूं
धीरे-धीरे दिल के दर्द को दफनाने लगी हूं
धीरे-धीरे इस दर्द भरी जिंदगी से
आजाद होकर जीने लगी हूं
इस दुनिया में होकर
इस दुनिया से दूर सपना
अपने सजने लगी हूं
आजकल मैं खुद में मुकम्मल होने लगी हूं
हां मैं हंसने लगी हूं
हां मैं खेलने लगी हूं
हमें सीखने लगी हूं
अब अपनी जिंदगी की रेत
सांसो डोर अब मैं अपने हाथों में पकड़ने लगी हूं
दिल पर हाथ रख कर
धड़कन की आवाज अपनी सुनाने लगी हूं
आंखों को छूट दे दी है सपने देखने की
और हाथों को इजाजत दे दी लिखने की
और होठों को आदत लगा दी है हंसने की
और पैरों को रहत दे दी है बेहकने की
धीरे-धीरे राहत भरी सांस लेने लगी हूं
आजकल मैं जीने लगी हूं
हां आजकल मैं जीने लगी हूं
यह कविता आप सबको अच्छी लगे तो
आग ेपढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभीनिशा ❤️🦋💯