इकरार की सज़ा।
हम भूलकर भी कहाँ कैसे कोई भूल करें,
आपने जो कह दिया है वही इकरार करें।
हर ज़ख़्म को ख़ामोशी से ही मंज़ूर करें,
मन पर जो गुज़र गया उससे पार करें।
तन्हा सफ़र में धूप ही क़िस्मत का हिस्सा,
छाँव की चाह में क्यों ख़ुद को बेकरार करें।
सच की चुभन को हँसते हुए सह जाएँ,
झूठी ख़ुशियों से क्यों मन बीमार करें।
वक़्त के फ़ैसले पर कोई शिकवा न रखें,
जो भी मिला है उसी पर विश्वास करें।
‘प्रसंग’ हर हाल में खामोशी से सहते रहें,
लोग जो भी कहें, उसे बस स्वीकार करें।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर